Saturday, April 8, 2023

Pushpa Bajaj

 


पुष्पा बजाज 


।।पुरूषोत्तम वन्दना।।

पुरूषोत्तम की करूं वन्दना. पुरूषोत्तम को नमन करूं।
जनम जनम मैं करूं वन्दना. जनम जनम मैं नमन करूं।।
पुरूषोत्तम की करूं वन्दना

आदि अनादि पुरूषोत्तम प्रभु. शत् शत् उनको नमन करूं।
सुख रंजन हैं दुख भंजन हैं. सादर उनको नमन करूं।।
पुरूषोत्तम की करूं वन्दना

अखिल लोक के पालन हारे. कोटि कोटि नमन करूं।
कण कण में प्रभु छवि तिहारी. प्राणों से मैं नमन करूं।।
पुरूषोत्तम की करूं वन्दना

हे अखिलेश्वर हे सर्वेश्वर. रोम रोम से नमन करूं।
हे पुरूषोत्तम पथ पर तोरे. जनम जनम मैं चला करूं।। 
पुरूषोत्तम की करूं वन्दना

अखंड अलौकिक रूप तिहारा. शोभा कैसे वर्णन करूं।
शरण में अपनी ले लो मुझको. हाथ जोड तोरे चरण पडुं।।
पुरूषोत्तम की करूं वन्दनार्र्र्र्र्र्र्र्र्र्



हो प्रणेता तुम इस युग के तुमसे जग आलोक प्रभु।
तुम हो प्रभुजी जग के पालक तुमसे जग आलोक प्रभु तुमसे जग आलोक प्रभु।।

हो प्रणेता तुम इस युग के।।।

जहां देखुं वहां तुम हो प्रभुजी भीतर और बाहर प्रभु।
छांव में भी तुम हो प्रभुजी तपती धूप में साथ प्रभु तपती धूप में साथ प्रभु।।
हो प्रणेता तुम इस युग के।।।

रोम रोम में रहने वाले श्वास श्वास में बसे हो प्रभु।
श्री चरणों में सब कुछ अर्पण वंदन करो स्वीकार प्रभु वंदन करो स्वीकार प्रभु।।
हो प्रणेता तुम इस युग के।।।

।।।।।।।।



कैसी प्रेम की डोरी बांधी प्रेम की ये डोरी।
कैसी प्रेम की डोरी ठाकुर  प्रेम की ये डोरी।। 
प्रेम की ये डोरी ठाकुर

डोरी तोरी नजर न आती मन में प्रेम जगाती है।
मन में केवल प्रेम जगाती मन में भाव जगाती ठाकुर मन में भाव जगाती।।
कैसी प्रेम की डोरी बांधी ।।।।

डोरी तोरी पूजा मोरी दुनिया मुझे नहीं भाती।
दुनिया नहीं भाती ठाकुर रास नहीं अब आती ठाकुर रास नहीं अब आती।।
कैसी प्रेम की डोरी बांधी ।।।।

नैनों में बस जाए तोरी मुरत और नहीं कछु चाहुं।
बस जाय तोरी बतिया मन में और नहीं कछु चाहुं ठाकुर और नहीं कुछ चाहुं।।
कैसी प्रेम की डोरी बांधी ।।।।


दूर करो तम मेरा स्वामी दूर करो तम मेरा 
मेरे स्वामी अन्तर्यामी दूर करो तम मेरा।।।
दूर करो तम मेरा स्वामी।।।

दया अपनी बरसाओ ठाकुर मन में ज्योत जगाओ स्वामी।
मुझको अपना दास बनाओ ठाकुर घट घट के हो स्वामी।
तेरी दया को दर दर भटकुं दूर करो तम मेरा ।।
दूर करो तम मेरा ठाकुर ।।।

हो कोटि ब्रह्यांड के नायक अखिल लोक के स्वामी ठाकुर
मोरे मन में ज्योत जगाओ दया अपनी लुटाओ ठाकुर
तेरे दरश को दर दर भटकुं दूर करो तम मेरा 
दूर करो तम मेरा ठाकुर ।।।

जो कोई तोरी शरण में आया उसने मारग पाया है।
तोरे मार्ग पर चलने वाला कबहु न धोखा खाया है। 
शीश नवाए दर पर खडा हूं दूर करो तम मेरा 
दूर करो तम मेरा ठाकुर ।।।




पुरूषोत्तम का भजन जो गावे पुनिः जगत में वो नहीं आवे।
मन से करो प्रणाम बन्दे करलो जीवन पार बन्दे 
मन से करो प्रणाम बन्दे।।

पुरूषोत्तम की बात निराली. जीवन होते सबके सुखाली।
पुरूषोत्तम हैं दया के धाम पुरूषोत्तम हैं सर्व सुखधाम।।
 पुरूषोत्तम को ध्याओ बन्दे करलो जीवन पार बन्दे 
मन से करो प्रणाम बन्दे

पुरूषोत्तम की भाव धारा. पथ पर डालो जीवन सारा।
आत्म स्वरूप मन में जगाओ पुरूषोत्तम के दर पर आओ।।
पुरूषोत्तम पूरणकाम बन्दे करलो जीवन पार बन्दे 
मन से करो प्रणाम बन्दे

पुरूषोत्तम मेरे अलख निरंजन सबके करते दुख भवभंजन।
पुरूषोत्तम अनित्य अविनाशी सब ज न के हैं सुखराशी।।
पुरूषोत्तम के जाओ बन्दे करलो जीवन पार बन्दे 
मन से करो प्रणाम बन्दे



जग को संवारने वाले ठाकुर जग को बचाने वाले।
रखियो मोरी लाज ठाकुर रखियो मोरी लाज।।
जग को बचाने वाले

भेद न जाने कोय तोरा मर्म न जाने कोय।
माया कबहु छु न सके प्रभु जहं तोरी कृपा होय।।
ज्योत जगाने वाले ठाकुर रखियो मोरी लाज।।
जग को बचाने वाले 

तत्व भी हो तुम मोरे देवा. तत्वज्ञ भी हो प्रभु आप।
कारण भी हो तुम मेरे ठाकुर और निवारण आप।
सबको बचाने वाले ठाकुर रखियो मोरी लाज।।
जग को बचाने वाले 


पुरूषोत्तम हो आप मोरे ठाकुर सर्वोत्तम हो आप।
मन में मोरे वास हो तोरा रहना हरदम साथ।।
सबको बढाने वाले ठाकुर रखियो मोरी लाज।।
जग को बचाने वाले 



कैसी ज्योत जगाई ठाकुर कैसी ज्योत जगाई है।
चारों ओर हुआ उजाला सबने शांति पाई ठाकुर सबने शांति पाई है।
कैसी ज्योत जगाई ठाकुर

भूले भटके दीन जनों ने राह अनोखी पाई है।
ह्दय माहीं ज्योत जगी नाम की महिमा पाई है नाम की महिमा पाई है।।
कैसी ज्योत जगाई ठाकुर

चरणों में तोरे जो कोई आए सबने शांति पाई है।
हम अज्ञानी मूरख कामी दया हमपर बरसाई ठाकुर दया हम पर बरसाई है।।
कैसी ज्योत जगाई ठाकुर

सकल लोक के आप हो नायक़ जन जन के हो सांई हैं।
चरणों में मुझको रखलो प्रभु अब नहीं कुछ भी चाही ठाकुर अब नहीं कुछ चाही है।।
कैसी ज्योत जगाई ठाकुर



ठाकुर तोरे दर पर मैं आया हूं दर्शन का प्यासा आशा मैं लाया हूं।।
ठाकुर तेरे दर पर मैं आया हूं

जीवन नैया इत उत डोले. राह नजर नहीं आवे।
हाथ जोड मैं तुझे पुकारूं. शरण में लेलो आए।
शरण में लेलो आए ठाकुर चरणों में ले लो आए।।
ठाकुर तेरे दर पर मैं आया हूं

सबके स्वामी अन्तर्यामी. दर्शन देदो आए।
जनम जनम का प्यासा हूं प्रभु. शक्ति दो मुझे आए।
शक्ति देदो आए ठाकुर तमश मिटाओ आए।
ठाकुर तेरे दर पर मैं आया हूं

दर दर ढूंढूं तुझे पुकारूं. पता न कोई बताए।
पता न कोई बताए राह न कोई दिखाए।
नैन मूंद जब बैठ गया मैं. तेरी छवि लखाए।।
ठाकुर तेरे दर पर मैं आया हूं




ठाकुर जी का भजन तुम गाओ जीवन को सफल बनाओ।
जीवन सफल बनाओ प्राणी. जीवन सफल बनाओ
ठाकुर जी का भजन तुम गाओ
पतित पावन ठाकुर हमरे. सबके उर में हैं नित रहते।
मोह माया तज कर सब अपने. शरण में उनकी आओ।।
ठाकुर जी का भजन तुम गाओ
पथ में उनकी नैन बिछाओ. ह्दय में उनको बसाओ।
श्वास श्वास में नाम जगाओ. उनसे लौ लगाओ।।
ठाकुर जी का भजन तुम गाओ
धीरज बढता हौंसला मिलता. चरणों में प्रेम जगाओ।
भाग्य विधाता धरा पर आया. अपना भाग जगाओ।।
ठाकुर जी का भजन तुम गाओ
द्वार पर तेरे कब से खडा हूं. ठाकुर मेरे आओ।




सुख रंजन हो भव भंजन हो. दया अपनी बरसाओ।
द्वार पे तेरे कब से खडा हूं. अब तो राह दिखाओ।
द्वार पर तेरे कब से खडा हूं

सब सेवक और दास खडे हैं. तोरे पास में सांई।
मुझे भी अपनी शरण में लेलो. आशा मोरे माय।।
द्वार पर तेरे कब से खडा हूं

अवगुण बहुत हैं मुझमें ठाकुर. जिनकी गिनती नाय।
मेटो मेरे मन का अन्धेरा. देदो ज्योत जगाय।।
द्वार पर तेरे कब से खडा हूं

तेरे पथ की धूल बन जाऊं. ऐसा भाग्य जगाओ।
पथ बुहारूं फूल बिछाऊं. राह में जहं तुम आओ।।
द्वार पर तेरे कब से खडा हूं




दर्शन कैसे पाऊं ठाकुर दर्शन कैसे पाऊं।
तोरे दरश को अंखिया तरसे दर्शन कैसे पाऊं।।
दर्शन कैसे पाऊं ठाकुर
तुझ बिन जीवन सुना ठाकुर रह रह याद मोहे आए।
राह चलुं तो राह नहीं दिखे और न कछु लखाए।
चारों ओर घिरा अन्धेरा दर्शन कैसे पाऊं ठाकुर।।
दर्शन कैसे पाऊं ठाकुर

तोरे दरस बिन मन मेरा ठाकुर पल पल बुझा जाए।
दरस दिखाओ आस पुराओ दया अपनी बरसाओ।
मुझको अबकी बेर ठाकुर पार लगाओ।।
दर्शन कैसे पाऊं ठाकुर

शरण में लेलो आज मोरे ठाकुर अब तो रहा न जाए।
श्री चरणों में सबकुछ अर्पण खडा मैं शीश नवाए।
तोसे रिश्ता जोड लिया है बन जाओ सहाय।।
दर्शन कैसे पाऊं ठाकुर 




सुन्दर तेरो नाम ठाकुर पावन तेरो नाम।
हो जाऊं निष्काम ठाकुर लेऊं जब तोरा नाम।।
सुन्दर तेरो नाम ठाकुर

माया से सब सृष्टि रचते सबके अन्दर तुमही बसते।
तोरा ही सब काम ठाकुर सबके घट के राम।
सबके घट के राम ठाकुर मोरा लो प्रणाम।।
सुन्दर तेरो नाम ठाकुर

परमात्मा हो सर्वात्मा हो न्यारे तोरे काम।
सबकी नैया पार लगाते अद्भूत तोरे काम।
अद्भूत तोरे काम मोरा लो प्रणाम ।।
सुन्दर तेरो नाम ठाकुर

परम पिता हो परमेश्वर हो सर्वेश्वर हो आप।
अखिलेश्वर हो जगदीश्वर हो हो पूरणकाम।
कण कण में समाने वाले मोरा लो प्रणाम।।
सुन्दर तेरो नाम ठाकुर




आयो तोरे द्वारे देवा तुमही मोरे सहारे।
तुमही मोरे सहारे देवा कोई न मुझको तारे।।
आयो तोरे द्वारे देवा

जीवन नैया अटक गई है हार के द्वार तेरे आयो।
अन्तर्यामी सबके स्वामी पारो मोहे लगाओ।।
आयो तोरे द्वारे देवा

बहुत सुना है नाम तुम्हारा दयाल तुम कहाओ।
शीश झुकाए दर पे खडा हूं दया अपनी दिखाओ।।
आयो तोरे द्वारे देवा

तुझ बिन सुना दिल का कोना ज्योत मन में जगाओ।
अखिल लोक के पालन हारा मुझको दरश दिखाओ।।
आयो तोरे द्वारे देवा




कैसो प्रेम अपार ठाकुर प्रेम अपार 
ले लिया सब भार ठाकुर वारी वारी जाऊं।
वारी वारी जाऊं वारी वारी जाऊं 
लेलिया सब भार ठाकुर वारी वारी जाऊं।।
कैसो प्रेम अपार।।।।।।।।।।

जीवन लिया सम्भाल ठाकुर सबकुछ लिया सम्भाल।
अब तो मेरे सबकुछ तुम हो रखियो मोरी लाज।
रखियो मोरी लाज वारी वारी जाऊ
कैसो प्रेम अपार।।।।।।।।।।

पल पल क्षीण क्षीण नाम मैं गाऊं तुझसे प्रीत जुराऊं।
तेरी दया की बात सुनाऊं इत उत जित मैं जाऊं।।
इत उत जित मैं जाऊं वारी वारी जाऊ
कैसो प्रेम अपार।।।।।।।।।।

अर्पण करूं मैं मन यह अपना. जीवन सफल हो जाए।
चरणों में तेरे शीश नवाऊं. सांझ सुबह चित लाए।।
सांझ सुबह चित लाए वारी वारी जाऊ
कैसो प्रेम अपार।।।।।।।।।।र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्



ठाकुर जी छवि तोरी कैसे मैं बिसराउं।
पुरूषोत्तम प्रभु छवि तोरी कैसे मैं बिसराउं
तुम बिन मेरा कोई नहीं तुम बिन मैं कित जाऊं
अब तो आओ पास बुलाओ तुझ बिन और कहां में जाऊं।
तुम बिन मैं कित जाऊं  ।।।।।।।।।।

राह घनेरी है कैसे तोरा पथ पाऊं।
चलते हुए हार गया तुझ बिन मैं कहां जाऊं।
तोरा पथ जो मिल जाए मेरा जीवन संवर जाए।।
पुरूषोत्तम प्रभु छवि तोरी कैसे मैं बिसराउं।।
तुझ बिन कहां मैं जाऊं ठाकुर ।।।।।।।।।।

तुझ बिन जीवन मेरा. चैन कहीं ना पाए।
पल पल मैं पुकारूं तुझे मन मेरा भर आए।
तोरा दरश जो मिल जाए मेरा मन ये सम्भल जाए।।
पुरूषोत्तम प्रभु छवि तिहारी कैसे मैं बिसराउं।।
तुझ बिन कहां मैं जाऊं ठाकुर।।।।।।।।।।

दीन दुखी के प्रभु तुम पालन हारे हो।
भक्त जनों के प्रभु तुम ही रखवारे हो।
सिर पर मेरे हाथ धरो मुझे चैन प्रभु आ जाए।।
पुरूषोत्तम प्रभु छवि तिहारी कैसे मैं बिसराउं।
तुझ बिन कहां मैं जाऊं ठाकुर।।।।।।।।।।र्र्र्र्र्र्र्र्र्



हाथ जोड कर शीश नवाऊं चरणों में।
हो समर्पण अन्तर्मन तोरे चरणों में।।

नाम की महिमा सुनकर आया तेरे चरणों में।
हो जाए उज्जवल मन ये मेरा चरणों में।।

कोई कहे तुम गिरवर होतुम रघुवर हो। 
हो जाए मन निर्मल मेरा चरणों में।।

सब सुख मिलता है प्रभु जी तेरे चरणों में।
हो अर्पित मन यह मेरा चरणों में।

अद्भूत शान्ति है ठाकुर तेरे चरणों में।
नैन मूंंद मैं नमन करूं तोरे चरणों में।र्र्र्र्र्र्र्र्र्




छवि तुम्हारी अजब निराली लोग रह्ये हरषाए ठाकुर।
लोग रह्ये हरषाए ठाकुर दर्शन कर कर धाए।।
छवि तुम्हारी अजब निराली

कभी लगाते मोर मुकुट तुम कभी धनुष उठाते।
अबकी बेर तुम ऐसे आए. सबका मन हरसाए।।
छवि तुम्हारी अजब निराली

नैन से छलके दया प्रेम की. प्रेम से सबही बंधाए।
प््रोम का दीपक ऐसा जलाया. घर घर भए उजाले।।
  छवि तुम्हारी अजब निराली

बनती बिगडी भाग्य की रेखा. तेरी दया मिल जाए।
तेरी दया मिल जाए तो प्राणी. भव में फिर नहीं आए।।
छवि तुम्हारी अजब निरालीर्र्र्र्र्र्





सांझ सवेरे मैं पुकारू ठाकुर तेरो नाम।
ठाकुर तेरो नाम मोरे प्रभुवर तेरो नाम।।
सांझ सवेरे मैं पुकारूं

रोम रोम में बसने वाले. जन जन के तुम प्राण।
जिसका न कोई संगी साथी उसके तुम भगवान।।
सांझ सवेरे मैं पुकारूं

दीन दुखी के पालन हारे. सकल लोक के श्याम।
भटके हुए को राह दिखाते. हरते सबका त्राण।।
सांझ सवेरे मैं पुकारूं

कण कण में तुम बसने वाले. सबके हो तुम राम। 
पारब्रह्य हो परमेश्वर हो. प्रभु पुरूषोत्तम आप।।
सांझ सवेरे मैं पुकारूंर्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्




मन के तार पुकार यही जय ठाकुर जी जय ठाकुर जी।
ठाकुर जी जय ठाकुर जी जय ठाकुर जी. जय ठाकुर जी।।
मन के तार पुकार यही
ठाकुर ठाकुर नाम बुलाओे. ठाकुर जी को मन में बसाओ।
पुरूषोत्तम खेवनहार यही जय ठाकुर जी जय ठाकुर जी।।
मन के तार पुकार यही
सृष्टि के पालन हार यही सबसे बडे दातार यही।
जग से करते पार यही जय ठाकुर जी. जय ठाकुर जी।।
मन के तार पुकार यही
इनकी महिमा सबसे न्यारी नाम जपो हो जाओ सुखारी।
जगतपिता करतार यही जय ठाकुर जी. जय ठाकुर जी।।
मन के तार पुकार यही
शीश झुकाओ शरण में आओ. सुरत अपनी आज जगाओ।
 पारब्रह्य अवतार यही जय ठाकुर जी. जय ठाकुर जी।।
मन के तार पुकार यहीर्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्





कैसे आऊं द्वार ठाकुर. कैसे आऊं द्वार।
सबकी नैया पार हो करते. मुझे लगाओ पार।।
कैसे आऊं द्वार 

पांच तत्व का पुतला ये. अवगुणों  गुणों की खान।
दीवार अहं की सबसे उंची. कैसे आऊं द्वार।। 
कैसे आऊं द्वार 

मोह ममता तजु मैं कैसे. क्रोध की भरमार।
परदा फिरा माया का मोपे. दिखे ना तेरा द्वार।।
कैसे आऊं द्वार
दया लुटाओ मुझपे अपनी. अब तो गया मैं हार।
जन जन के तुम हो रखवारे. विनति सुनो करतार।।
कैसे आऊं द्वारर्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्





पुरूषोत्तम प्रभु धरणी पर आए. आर्त दुखी जन शांति पाए। 
जय जय जय जय पुरूषोत्तम।जय जय जय जय पुरूषोत्तम।।
जय जय जय जय 
शांति के दाता परम विधाता नाम जो सुमिरे सतपथ पाता। 
सबके स्वामी अन्र्तयामी नाम जपो हो जाओ सुखाली।।
जय जय जय जय पुरूषोत्तम।
स्वागत करें मिल पुरूषोत्तम का. राह बुहारें पुरूषोत्तम का। 
नमन करें पुरूषोत्तम का जपन करें पुरूषोत्तम का
जय जय जय जय पुरूषोत्तम।
दिव्य है लीला पुरूषोत्तम की. दिव्य है कृपा पुरूषोत्तम की।
दिव्य है करूणा पुरूषोत्तम की. दिव्य है महिमा पुरूषोत्तम की।
जय जय जय जय पुरूषोत्तम।
पुरूषोत्तम हैं सबसे न्यारे. पुरूषोत्तम हैं जग रखवारे।
पुरूषोत्तम हैं प्राण आधारे. पुरूषोत्तम हैं खेवनहारे।
जय जय जय जय पुरूषोत्तम।र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्






ठाकुर जी मुझे राह दिखाओ जी. खडा हूं कब से द्वार तिहारे।
तोरी मूरत ठाकुर अति मनभावन जी. भक्तों के भगवन हो सहारे।। 
ठाकुर जी मुझे राह दिखाओ जी
खडा हूं मैं तो बीच भंवर में जी. ठाकुर मेरे पार लगाओ।
तेरी दया की बातें जग बतावे जी. अब तो भगवन दया बरसाओ।।
ठाकुर जी मुझे राह दिखाओ जी
मेघा छाए बादल गरजे जी. बिजली चमके भक्त तोरा डरपे।
बडी दूर से मैं तो चल कर आया जी. इक बर तो ठाकुर खोलो द्वारे।
ठाकुर जी मुझे राह दिखाओ जी
सारे जग का भार उठाऐ हो. मेरी भी सुनलो खडा हूं द्वारे।
पूण्य की पूंजी मेरे पास नाहीं जी. पग धूल बनजाऊं चरणों की तेरे।।
 ठाकुर जी मुझे राह दिखाओ जी
धरा के स्वामी आप कहावो जी. शरणागति ठाकुर मांगु कर जोडे।
तोरे कुलकी रीति अजब निराली जी. शरणागत कबहुं खाली न जावे।। 
ठाकुर जी मुझे राह दिखाओ जी


 

धन्य हुआ प्रभु जीवन मेरा श्री चरणों में पाया बसेरा।
धन्य हुआ प्रभु जीवन मेरा श्री चरणों में पाया बसेरा।
धन्य हुआ प्रभु जीवन मेरा
हरि नाम की धून जगाई श्री चरणों में लौ लगाई।
आस विश्वास की ज्योत जलाई सबके मन में आस जगाई।।
धन्य हुआ प्रभु जीवन मेरा
दुख अभाव को दूर भगाई जीने की नई राह दिखाई।
अटल विश्वास ले जो कोई आया उसने मन में शांति पाई।। 
धन्य हुआ प्रभु जीवन मेरा
पुरूषोत्तम जब आते हैं शीतलता सब जन पाते हैं।
पावन सब हो जाता है शरण में जो उनके आता है।।
धन्य हुआ प्रभु जीवन मेरा




ओ ठाकुर मोहे इतना बता देना
किस पथ पे जाऊं राह दिखा देना।
ओ ठाकुर मोहे।।।
यह जग की माया कहीं भरमा दे ना।
हाथ पकडकर पार लगा देना।।
ओ ठाकुर मोहे।।।
अन्धेरा इतना घिर घिर आता है।
जीवन में मेरे ज्योत जगा देना।।
ओ ठाकुर मोहे।।।
जग ने मुझको बहुत रूलाया है।
गोद में अपनी आज उठा लेना।।
ओ ठाकुर मोहे।।।
सुना है सब पर कृपा बरसाते हो।
दास पे अपनी दया लुटा देना।
ओ ठाकुर मोहे।।।
पुरूषोत्तम प्रभु अन्तर्यामी हो।
चरणों की अपने धूल बना लेना।।
ओ ठाकुर मोहे।।।र्र्र्र्र्र्र्
 


ओ ठाकुर तोरा कैसे गुणगाण करूं 
तोरे रूपकी महिमा कैसे बखान करूं।
ओ ठाकुर तोरा
मुख मंडल तोरा भल भल भलकैजी
शोभा की महिमा कैसे बखान करूं।
ओ ठाकुर तोरा
तोरे नैनों का नेह छल छल छलकै जी
तोरे प््रोम की महिमा कैसे बखान करूं।
ओ ठाकुर तोरा
तोरी मीठी वाणी ज्ञान जगावे जी
शब्दों की महिमा कैसे बखान करूं।
ओ ठाकुर तोरा
तोरे नाम की महिमा है बहुत अनोखी जी।
अद्भूत महिमा कैसे बखान करूं।
ओ ठाकुर तोरा
जो कोई तोरी शरण में आवे जी।
शरणागत की महिमा की कैसे बखान करूं।
ओ ठाकुर तोरा



कहां मैं ढुंढू कहां मैं जाऊं. ठाकुर मेरा ठाकुर मेरा नजर नहीं आया।
कहां मैं ढुंढू।।।
रात दिवस ढूंढा पता नहीं पाया।
सांझ सवेरे ढूंढा पता नहीं पाया।
त्रिलोक  में बसने वाले।।। त्रिलोक में बसने वाले।।। नजर नहीं आया।।
कहां ढुंढू मैं ।।।

वन वन ढूंढा पता नहीं पाया।
जन जन में ढूंढा पता नहीं पाया
अन्तर्मन में बसने वाले।।। अन्तर्मन में बसने वाले।।। नजर नहीं आया।।
कहां ढुंढू मैं ।।।

श्वास श्वास में तोहे ढूंढा पता नहीं पाया।
घर बाहर ढूंढा पता नहीं पाया।
रोम रोम में बसने वाले।।। रोम रोम में बसने वाले।।। ं नजर नहीं आया।।
ठाकुर नजर कहीं नहीं आया।
कहां ढुंढू मैं ।।।

सत्संगी मेें ढूंढा पता वहीं पाया।
भक्तों में ढूंढा पता वहीं पाया।
भक्तों में रमने वाले।।। भक्तों में रमने वाले।।। नजर वहीं ही आया।।
कहां ढुंढू मैं ।।।र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्



मनवा करे पुकार ठाकुर आज तोहे आना है।
मनवा करे पुकार।।। 
मनवा करे पुकार।। ठाकुर आज तोहे आना है. तोहे दरस दिखाना है
मनवा करे ।।।
आज ठाकुर जी मैंने बुलाया है आना होगा जी।
घर सजाया है पथ बुहारा है आसन लगाया है। 
मन से करूं पुकार।। मन से करूं पुकार 
ठाकुर आज तोहे आना है।
मन से करूं पुकार।।

राह सजाई है क्यारी लगाई है द्वार बनाया है।
भक्त आए हैं भाव लाए हैं. दर्शन देना है।।
भक्त करे पुकार।। भक्त करे पुकार 
ठाकुर आज तोहे आना है।
भक्त करे पुकार।।

वचन निभाते हो वादा निभाते हो फिर क्यों देर करो।
मन घबराता है सब्र न आता है अब मत देर करो।।
मेरी है फरियाद।। मेरी है फरियाद।।
ठाकुर आज तोहे आना है।
मेरी है फरियाद।।र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्





मुझको देना ज्ञान ठाकुर मुझको देना ज्ञान।
मुझको देना ज्ञान ठाकुर मुझको देना ज्ञान मैं करूं तेरा गुणगान 
मुझको देना ज्ञान

सबके पथ को रौशन करते हो सबके दुख हरते  हो।
नाम जो लेता पार वो लगता मन समर्पण करता है।
जन जन के हो राम जन जन के हो राम ठाकुर मुझको भी दो ज्ञान।।
जन जन के हो राम 

जो कोई तोरी शरण में खडा है ठाकुर भव से पार हुआ।
सच्चे मन से जो ध्याया प्रभु तोहे वो उद्धार हुआ।
हो दया के धाम हो दया के धाम ठाकुर मुझको भी दो ज्ञान।।
हो दया के धाम ।।।

सब जग का हे स्वामी मंगल करते हो शांति देते हो।
भक्तों के उर में  आप रहते हो अशांति हरते हो। 
बहुत तिहारा नाम बहुत तिहारा नाम ठाकुर मुझको भी दो ज्ञान।।
बहुत तिहारा नाम।।।

हाथ जोड मैं द्वार खडा तोरे चरणों में तोरे शीश धरूं।।
ज्ञान से मन का दीप जलाऊं नैया पार करूं।
हे करूणानिधान हे करूणानिधान मुझको भी दो ज्ञान।।
हे करूणानिधान।।।



आयो तेरे द्वारे ठाकुर आयो तेरे द्वारे।
परमेश्वर मेरे पुरूषोत्तम प्रभु मेरे. तुम्ही मेरे सहारे।।
आयो तेरे द्वारे ।।।

दर्शन दे दो. शरण में ले लो अब तो जीवन हारे।
पूण्य पाप मैं कछु नहीं जानूं सब से हुआ किनारे।।
हे पुरूषोत्तम प्रभु हे पुरूषोत्तम प्रभु आयो तेरे द्वारे।
हे पुरूषोत्तम


सब गुण आगर हो दया सागर हो मुझ पर दया करो।
जनम जनम प्रभु मैं दास रहुं तेरा इतनी दया करो।।
लेकर दास ये विनति लेकर दास ये विनति आयो तेरे द्वारे।
लेकर दास ये विनति

नाम की महिमा सतनाम की महिमा लिया जो निहाल हुआ।
तोरे चरणों में चित्त अपना जो प्राणी रख पाया वो निहाल हुआा।
अनित्य अनादि अनन्त अनित्य अनादि अनन्त प्रभु आयो तेरे द्वारे।।
अनित्य अनादि अनन्तर्र्र्र्र्र्र्





धन्य धन्य पुरूषोत्तम प्रभु धन्य धन्य पुरूषोत्तम प्रभु
धन्य धन्य तोरा नाम प्रभु धन्य धन्य तोेरा धाम प्रभु
धन्य धन्य प्रभु ।।।

सगुण निर्गुण का भेद बताए. तत्व तत्वज्ञ की बात समझाए।
ज्ञानी ध्यानी निहाल हुए सहज रूप ले धरा पर आए। 
सबसे उंचा लोक है तोरा सबसे उंचा धाम प्रभु।।
धन्य धन्य पुरूषोत्तम प्रभु।।।

सनकादि ब्रह्यादि करे उपासना सब देव करते हैं प्रणाम प्रभु।
ऋषि मुनि तपस्वी सारे. रात दिवस जपे नाम प्रभु।
सबसे उंचा लोक है तोरा सबसे उंचा धाम प्रभु।।
धन्य धन्य पुरूषोत्तम प्रभु।।।

समस्त जीव में वास तिहारा सबके पूरणकाम प्रभु।
भक्त खडे कर जोड पुकारे. केवल तोरा नाम प्रभु। 
सबसे उंचा लोक है तोरा सबसे उंचा धाम प्रभु।।
धन्य धन्य पुरूषोत्तम प्रभु।।।





सतनाम की महिमा अपार ऐे बन्दे. होंगे भव से पार रे
नाम के साथ में नामी आए. उनकी शक्ति अपार रे।।
सतनाम की महिमा ।।।
प्रभु पुरूषोत्तम धरणी पर आए. सतनाम की महिमा आओ गाएं।
चरण पकड हम वन्दना गाएं. नाम ध्यान से उनको  रिझाएं।।
सतनाम की महिमा ।।।
ज्ञानी ध्यानी अज्ञानी मिल सब आओ. आओ उनके द्वार रे।
जीवन अपना उज्जवल करलो. हो जाओ निहाल रे।।
सतनाम की महिमा ।।।
प्रभु पुरूषोत्तम हैं मोरे ठाकुर. वे तो हैं लखदातार रे।
उनकी शरण में जो कोई आवे. कोटि जनम पार रे।।
सतनाम की महिमा ।।।
हैं अविनाशी सब घट वासी. करते बेडा पार रे।
अलख निरंजन हैं भवभंजन. कर देते उद्धार रे।।
सतनाम की महिमा ।।।र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्




सुनो सुनो इक बात सुनो. पुरूषोत्तम के द्वार चलो।
जीवन दिन दिन बिता जाए. पुरूषोत्तम के द्वार चलो।।
जीवन दिन दिन  ।।।
न जाने कब घना अन्धेरा होगा आधी रात को।
 छोडो भ्रमजालों कोे उनकी शरण में आए चलो।
दोष अवगुण अपनावेंगे पुरूषोत्तम के द्वार चलो।।
जीवन दिन दिन  ।।।
जनम जनम के ताप हरते सब पे दया करते हैं।
जो कोई आता उनकी शरण में अभय दान देते हैं।
अन्तर्यामी घट घट स्वामी पुरूषोत्तम के द्वार चलो।।
जीवन दिन दिन  ।।।
दिव्य रूप है दिव्य है आभा दिव्य ज्योति उनकी है।
उनकी दया से चहुं लोक में सूर्य की ज्योत निकलती है।
करो समर्पण सर्व अपना पुरूषोत्तम के द्वार चलो।।
जीवन दिन दिन 




ज्योत जगाई राह दिखाई. कैसी दया बरसाई प्रभु।
हम तो जीवन हार गए थे. तुमने राह दिखाई प्रभु।
ज्योत जगाई राह ।।।
पडी भंवर में जब मेरी नैया तूने पार लगाई प्रभु।।
हम तो जीवन हार गए थे. तुमने राह दिखाई प्रभु।
ज्योत जगाई राह ।।।
जग ने मुझको बहुत रूलाया तूने बांह बढाई प्रभु
हम तो जीवन हार गए थे. तुमने राह दिखाई प्रभु।
ज्योत जगाई राह ।।।
हे पुरूषोत्तम हे सर्वोत्तम निर्बल के सांई प्रभु।
हम तो जीवन हार गए थे. तुमने राह दिखाई प्रभु।
ज्योत जगाई राह ।।।




कैसी ठाकुर राह दिखाई
पडी भंवर में नैया पडी भंवर में नैया पार लगाई।
कैसी ठाकुरजी राह दिखाई
समता आई ममता पाई घर घर में सुख शान्ति छाई।
कैसी प्रभु जी तुने।।। कैसी प्रभु जी तुने ज्योत जगाई।।
कैसी ठाकुरजी राह दिखाई
शान्ति के दाता भाग्य विधाता और नहीं अब कुछ भी भाता।
तोरी मुरतिया।।। तोरी मुरतिया प्रभु मोरे मन भाई।।
कैसी ठाकुर राह दिखाई
सबके मन में आशा भरते सबका अमंगल दूर कर देते।
दे दो ठाकुर।।। मुझे दे दो ठाकुर अपनी सेवकाई।।
कैसी ठाकुर राह दिखाई
चित्त से मुझको भुला नहीं देना शरण में अपनी मुझको लेना। 
चरणों में अपने चरणों में अपने रखना सांई।।
कैसी ठाकुर राह दिखाई



आप हो ठाकुर दया के धाम  आप हो ठाकुर दया के धाम।
पथ बुहारूं ठाकुर बाट निहारूं ठाकुर आओ धाम।।1।।
आप हो ठाकुर दया के धाम
जीवन मेरा चरणों में अर्पित जाऊं कहां मैं सबही समर्पित।
चैन न पाऊं तुझ बिन चैन न पाऊं तुझ बिन आठो याम।।2।।
 आप हो ठाकुर दया के धाम
बहुत ही पावन रूप तिहारा अति मनभावन नाम तिहारा।
भाव जगादो मन में ज्योत जगादो मन में होऊं पूरणकाम।।3।।
आप हो ठाकुर दया के धाम
कैसे आऊं कुछ नहीं दिखे राह चलुं तो पथ नहीं दिखे।
आप बुलालो मुझे पास बुलालो मुझे सर्व सुखधाम।।4।।
आप हो ठाकुर दया के धाम
तुझ बिन मेरी कौन ले खबरिया छुटा जाए मन का सबरिया।
हे पुरूषोत्तम मेरे हे पुरूषोत्तम ले लो प्रणाम।।5।।
आप हो ठाकुर दया के धाम



और न जाऊं कोई डगरिया और न जाऊं कोई डगरिया।
मन को तो भावे केवल नाम तोरा ठाकुर

ह्दय में बसी है छवि तिहारी मन ये मेरा न जाए सम्भारी।।
मन को तो भावे केवल मन को तो भावे केवल नाम तोरा ठाकुर
और न जाऊं कोई डगरिया

सावन भादो मेघ जब आवे ठाकुर तोरी याद सतावे।
दीनजन मिल लेवे दीनजन मिल लेवे नाम तोरा ठाकुर
और न जाऊं कोई डगरिया

जीवन में जब आए अन्धेरा कहीं न दीखे कोई सवेरा।
हर घडी रहते हर घडी रहते साथ मोरा ठाकुर।।
और न जाऊं कोई डगरिया

आप बिना मेरा मन घबराता और नहीं कुछ मुझको भाता।
इक झलक जो तोरी इक झलक जो तोरी मिल जाए ठाकुर।।
और न जाऊं कोई डगरियार्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्




कहां मैं जाऊं कौन अपनाए
तुम बिन बिगडी ठाकुर तुम बिन बिगडी ठाकुर कौन बनाए।
कहां मैं जाऊं कौन अपनाए

नैया मेरी डगमग डोले तुझ बिन ठाकुर खाए हिचकोले।
तुझ बिन भार प्रभु तुझ बिन भार प्रभु कौन उठाए।।
कहां मैं जाऊं कौन अपनाए

नैनों में बसी प्रभु तोरी सूरतिया मन में बसी है तोरी मूरतिया।
चैन न आए प्रभु चैन आए बिन दर्शन पाए।। 
कहां मैं जाऊं कौन अपनाए

रात दिवस ठाकुर लगन लगी है तोरी छवि ठाकुर मन में बसी है।
अपना बनालो मुझे अपना बनालो मुझे अब तो आए।।
कहां मैं जाऊं कौन अपनाए

तोरे चरण में ठाकुर शान्ति पाऊं और कहीं ठाकुर अब नहीं जाऊं।
दास बनालो मुझे दास बनालो मुझे हाथ बढाए।।
कहां मैं जाऊं कौन अपनाए




पुरूषोत्तम धरा पर आए उनकी शरण में जो कोई आए
वे लोग सभी हरसाए बन्धु आओ रे 
पुरूषोत्तम धरा पर आए

यह दुनिया है इक माया इससे निकल नहीं कोई पाया
सब ओर ही भरमाया बन्धु आओ रे 
पुरूषोत्तम धरा पर आए

होते हैं जो उनके हवाले बनते हैं वे रखवाले
करते उनके ह्दय उजाले बन्धु आओ रे 
पुरूषोत्तम धरा पर आए

अद्भूत है उनकी वाणी कहीं और न कोई सानी
तर जाते मूरख अज्ञानी बन्धु आओ रे 
पुरूषोत्तम धरा पर आए

माया जग की हरते मन को है निर्मल करते
जीवन में खुशियां भरते बन्धु आओ रे 
पुरूषोत्तम धरा पर आए

देते सबको हैं वो शान्ति मिट जाती सारी भ्रांति
जागे दिव्य सबकी कांति बन्धु आओ रे 
पुरूषोत्तम धरा पर आए

हैं ठाकुर अनित्य अनादि उनका कोई नहीं है आदि
पूजे सनकादी ब्रह्यादि बन्धु आओ रे 
पुरूषोत्तम धरा पर आए

चरणों में उनकी आओ जीवन अपना सफल बनाओ 
अपना लक्ष्य उत्तम पाओ बन्धु आओ रे 
पुरूषोत्तम धरा पर आए


 

।।उठै तो बोले राम।।
यहां भी जाऊं ठाकुर मैं वहां जाऊं ठाकुर।
ये ठाकुर ठाकुर ठाकुर मैं जहां भी जाऊं ठाकुर।।
मेरा ठाकुर ठाकुर ठाकुर
मैं जहां भी जाऊं ठाकुर
ठाकुर जी हैं पुरूषोत्तम ठाकुर जी हैं सर्वोत्तम।
हैं सबसे ही उत्तम ये ठाकुर ठाकुर ठाकुर 
मेरा ठाकुर ठाकुर ठाकुर
मैं जहां भी जाऊं ठाकुर
ये परम पिता परमेश्वर ये सिद्धेश्वर अखिलेश्वर।
हैं स्वयं जगदीश्वर ये ठाकुर ठाकुर ठाकुर 
मेरा ठाकुर ठाकुर ठाकुर
मैं जहां भी जाऊं ठाकुर
ये सबके अन्तर्यामी ये अखिल लोक के स्वामी।। 
सब जग इनका गामी ये ठाकुर ठाकुर ठाकुर 
मेरा ठाकुर ठाकुर ठाकुर
मैं जहां भी जाऊं ठाकुर
ये सबका है रखवारा ये सबका पालन हारा।
ये लगता सबको प्यारा ये ठाकुर ठाकुर ठाकुर 
मेरा ठाकुर ठाकुर ठाकुर
मैं जहां भी जाऊं ठाकुरर्र्र्र्र्र्र्र्र्




ठाकुर जी तोरे रहे चरणों में मेरा ध्यान।
ठाकुर जी तोरे रहे चरणों में

हाथ जोड कर विनती करूं मैं देना चरणों में स्थान।
प््राभु पुरूषोत्तम हो मोरे ठाकुर दास का रह जाए मान।।
ठाकुर जी तोरे रहे चरणों में

मैं मूरख अज्ञानी ठाकुर नहीं है मुझमें ज्ञान।
पढा लिखा मैं नाहीं ठाकुर रखना दास की आन।।
ठाकुर जी तोरे रहे चरणों में

तोरी महिमा कोई न जाने जो जाने सो पार।
मुझको अपनी शरण में लेना कर देना उद्धार।।
ठाकुर जी तोरे रहे चरणों में

भक्तजन तोरे द्वार खडे हैं दरश की आस लगाय।
दर्शन देदो भय सब हरलो हो जाओ सहाय।।
ठाकुर जी तोरे रहे चरणों में



पुरूषोत्तम की अद्भूत महिमा प्रभु पुरूषोत्तम की अद्भूत महिमा ।
जान सके ना कोय जान सके ना कोय महिमा जान सके ना कोय।।
पुरूषोत्तम की अद्भूत महिमा

रात दिवस जो इन्हें ध्यावे जीवन सफल हो जावे।
जन जन के हैं प्राणों के प्यारे सबका जीवन तारे।
इनकी बातें सब अनमोल इनकी बातें सब अनमोल जान सके ना कोय।।
पुरूषोत्तम की अद्भूत महिमा

ज्ञानी ध्यानी आवे चाहे मूरख अज्ञानी ध्यावे।
जो कोई इनको ध्याता उनका भाग्य बन जाता।
इनका रूप दे अमृत घोल इनका रूप दे अमृत घोल जान सके ना कोय।।
पुरूषोत्तम की अद्भूत महिमा




प्राणी ठाकुर ठाकुर बोल अपने अन्दर में अमृत घोल
जीवन में अमृत घोल अपने मन में अमृत घोल
प्राणी ठाकुर ठाकुर बोल

प्रभु पुरूषोत्तम धरा पर आए भाग्य को पार लगाले।
भाग्य को पार लगाले जीवन सफल बनाले।
भाग्य देंगे तेरा मोड अपने अन्दर में अमृत घोल।।
प्राणी ठाकुर ठाकुर बोल

पे्रम शांति का पथ दिखाया सबका पाप ताप मिटाया।
उसका बेडा लगाया जो राह पर उनके आया।
ले अपना सुख बटोर अपने अन्दर में अमृत घोल।।
प्राणी ठाकुर ठाकुर बोलर्र्र्र्र्र्






हे जग पिता जग स्वामी हो आप अन्तर्यामी
मैं द्वार खडा हूं आय ठाकुर सुध हमारी लेवो।।
सुध हमारी लेवो सुध हमारी लेर्वो 2
मैं द्वार खडा हूं आय ठाकुर

साथ कुछ नहीं लाया हे नाथ खाली आया।
शरण तिहारी आया ठाकुर सुध हमारी लेवो।।
सुध हमारी लेवो सुध हमारी लेर्वो 2
मैं द्वार खडा हूं आय ठाकुर

तन का भी हूं मैं काला और मन का भी हूं काला।
दे दो दया का प्याला ठाकुर सुध हमारी लेवो
सुध हमारी लेवो सुध हमारी लेर्वो 2
मैं द्वार खडा हूं आय ठाकुर

मैं राह अन्धेरी आया और पथ में कांटें पाया।
मैं थका और भरमाया ठाकुर सुध हमारी लेवो
सुध हमारी लेवो सुध हमारी लेर्वो 2
मैं द्वार खडा हूं आय ठाकुर

सब कहते हैं आप परमेश्वर हो जग के जगदीश्वर।
जग से पार लगाओ ठाकुर सुध हमारी लेवो
सुध हमारी लेवो सुध हमारी लेर्वो 2
मैं द्वार खडा हूं आय ठाकुर




पुरूषोत्तम प्रभु जी मेरी भी सुधि लेना।
ठाकुर जी मोरे मेरी भी सुधि लेना।।
पुरूषोत्तम प्रभु जी द्वार बुला लेना

इस जग में प्रभु कोउ नहीं  मेरा तु ही एक सहारा।
तेरी दया की चाह मोहे तु ही एक सहारा।। 
पुरूषोत्तम प्रभु जी

भक्तजन तोरे आगे खडे सब मेरी बारी कब आए।
मोरी भी सुध लेना ठाकुरजी शरण में तोरी आए।।
मेरे पुरूषोत्तम प्रभु जी

गुणी मुणी सब पास में तेरे मैं मूरख अज्ञान। 
पास में तोरे आऊं कैसे ना कोई मुझको ज्ञान।।
पुरूषोत्तम प्रभु जी

नाम का दीवा मन में जलाके आया तेरे द्वार।
द्वारपाल बहु सारे खडे हैं दूर से लेवो सम्भाल।।
पुरूषोत्तम प्रभु जी

श्री चरणों में श्रद्धा मेरी कर लेना स्वीकार।
हाथ जोड प्रणाम करूं मैं मुझको लगाना पार।।
पुरूषोत्तम प्रभु जीर्र्र्र्र्र्र्र्




ठाकुर की महिमा अपरम्पार ठाकुर की जयजयकार करो।
ठाकुर हैं जग आधार ठाकुर की जय जयकार करो
ठाकुर की जयजयकार करो

ठाकुर ने सतनाम जगाया सतनाम का ऐसा मर्म बताया।
नाम से होगा बेडा पार ठाकुर की जय जयकार करो
ठाकुर की जयजयकार करो

जन जन में सतनाम जगाते सबकी विपदा दूर भगाते।
नाम ठसे करते उद्धार ठाकुर की जय जयकार करो
ठाकुर की जयजयकार करो।

सब मिलकर ठाकुर को ध्याओ सतनाम की धून जगाओ।
नाम से करलो नैया पार ठाकुर की जय जयकार करो
ठाकुर की जयजयकार करो।

ठाकुर चरणों में भक्ति जगालो जीवन अपना सफल बनालो।
करते सबको निहाल ठाकुर की जय जयकार करो
ठाकुर की जयजयकार करो।




मीठी वाणी रे ठाकुर जी की मीठी वाणी रे।
सब मिल बोलो रे भक्तजन मिल सब बोलो रे।
ठाकुर जी की जय जय बोलो रे।

जग उद्धारक  हैं ठाकुर जी जग के पालक हैं।
सबके प्रतिपालक हैं भक्तजन मिल सब बोलो रे।
ठाकुर जी की जय जय बोलो रे।

राह दिखाते हैं वे सबकी बिगडी बनाते हैं।
वे सबको पार लगाते हैं भक्तजन मिल सब बोलो रे।
ठाकुर जी की जय जय बोलो रे।

छवि निराली है अद्भूत बात निराली है।
करते रखवाली हैं भक्तजन मिल सब बोलो रे।
ठाकुर जी की जय जय बोलो रे।

द्वार पर आओ रे ठाकुर की शरण में आओ रे 
प्रभु के चरण पखारो रे भक्तजन मिल सब बोलो रे।
ठाकुर जी की जय जय बोलो रे।

आए कुल स्वामी रे सबके हितकामी रे। 
हैं निष्कामी रे भक्तजन मिल सब बोलो रे।
ठाकुर जी की जय जय बोलो रे।र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्



चहुं ओर हुआ है शोर प्रभु आए हैं प्रभु आए हैं।
चरण पखारो आज प्रभु मोरे आए हैं।
चहुं ओर हुआ है शोर

सब जन करे अरदास प्रभु मोरे आए हैं प्रभु आए हैं।
कर जोड करो प्रणाम प्रभु मोरे आए हैं।
चहुं ओर हुआ है शोर

प्रभु का रूप अरूप और मन भावन है मन भावन है।
दिव्य छटा अति सुन्दर प्रभु मोरे आए हैं।
चहुं ओर हुआ है शोर

पथ बुहारो सब मिलकर प्रभु मोरे आए हैं प्रभु आए हैं।
प्रेम का ज्योत जलाओ प्रभु मोरे आए हैं।
चहुं ओर हुआ है शोर

आसन देवो बिछाय प्रभु मोरे आए हैं प्रभु आए हैं।
भोग का लाओ थाल प्रभु मोरे आए हैं।
चहुं ओर हुआ है शोर

पंखा देवो ढाल प्रभु मोरे आए हैं प्रभु आए हैं।
नजर उतारो आज प्रभु मोरे आए हैं।
चहुं ओर हुआ है शोर


शोर न करो कोई ओर प्रभु मोरे आए हैं प्रभु आए हैं।
सोवन को बिछाओ सेज प्रभु मोरे आए हैं।
चहुं ओर हुआ है शोर

गति मधूर सब गाओ प्रभु मोरे आए हैं प्रभु आए हैं।
गति खुशी के गाओ प्रभु मोरे आए हैं।
चहुं ओर हुआ है शोर




नजर तो उठाओ ठाकुर आए तोरे द्वार हैं
भक्त पुकारे और खडे तोरे द्वार हैं
नजर तो उठाओ ठाकुर

बडी निराली लीला रचाई माया भी प्रभु पार न पाई।
नाम की महिमा सबमें जगाई नाम से सारी बात बनाई।
बडी अनोखी तेरी सब चाल है 
भक्त पुकारे और खडे तोरे द्वार हैं।।
नजर तो उठाओ ठाकुर

ऋद्धि सिद्धि सब द्वार तिहारे हाथ जोड कर तोहे पुकारे।
सब देवों का आपमें वास है भक्तों के वश में रहते आप हैं।
बडा ही कमाल प्रभु बहुत कमाल है 
भक्त पुकारे और खडे तोरे द्वार हैं।।
नजर तो उठाओ ठाकुर
सबकी नैया पार लगैया रूप तिहारा जैसे कन्हैया।
भक्त खडे मिल करते पुकार हैं तोरी दया की बस एक चाह है।
दीन दुखी के स्वामी खेवनहार हैं 
भक्त पुकारे और खडे तोरे द्वार हैं
नजर तो उठाओ ठाकुर
ठाकुर नाम का भर भर प्याला जो पीवे हो जाए निहाला।
पुरूषोत्तम प्रभु दीन दयाला शरण में आए होए निहाला।
बडा ही अनोखा ठाकुर तोरा संसार है 
भक्त पुकारे और खडे तोरे द्वार हैं 
नजर तो उठाओ ठाकुरर्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्




ठाकुर जी की बात
ठाकुर जी की बात भक्तों सबसे निराली हैं वे करते रखवाली हैं।
ठाकुर जी की बात

बडे कृपालु हैं जो भक्त श्रद्धालु हैं दया वे जान पाए हैं।
प्रेम और भक्ति सतनाम की शक्ति जो जन जगाए हैं।।
उनकी दया की बात उनकी दया की बात भक्तों सबसे निराली हैं।
वे करते रखवाली हैं ठाकुर जी की बात।।
ठाकुर जी की बात

पुरूषोत्तम प्रभु का नाम पुरूषोत्तम प्रभु का ध्यान जो जन लगाते हैं।
निष्काम ही पूजा निष्काम ही सेवा वे जन पाते हैं।।
सबमें छवि उनकी सबमें छवि उनकी रहती समाई है।
वे देते दिखाई हैं ठाकुर जी की बात।।
ठाकुर जी की बात

कर जोड प्रणाम करो बस उनका ध्यान धरो अवगुण मेटेंगे।
श्रद्धा में उनके शीश झुका देना वे सबकुछ देवेंगे।।
भक्त से भगवान भक्त से भगवान मिलने को आए हैं।
वे सबमें समाए हैं ठाकुर जी की बात।।
ठाकुर जी की बात



दीन दुखी के पालन हारे सबके हो हितकामी 
प्रभु जन जन के हो स्वामी प्रभु जन जन के हो स्वामी
सब मिलकर राधास्वामी बोलो
राधास्वामी बोलो भक्तों राधास्वामी बोलो



ठाकुर जी मोरे दर्शन दे दो जी मोरा मनवा तरसे ठाकुर जी।
ओ ठाकुर मोरे दर्शन दे दो आज

दीन दुखी के पालन हारे सबके हो हितकामी 
प्रभु जन जन के हो स्वामी प्रभु जन जन के हो स्वामी
सब मिलकर राधास्वामी बोलो
राधास्वामी बोलो भक्तों राधास्वामी बोलो

ठाकुरजी मोरे अब ना सतावो जी मोरा मनवा तरसे ठाकुर जी
ओ ठाकुर मोरे दर्शन दे दो आज

दीन दुखी के पालन हारे सबके हो हितकामी 
प्रभु जन जन के हो स्वामी प्रभु जन जन के हो स्वामी
सब मिलकर राधास्वामी बोलो
राधास्वामी बोलो भक्तों राधास्वामी बोलो

ठाकुरजी मैं तोे द्वार पर आया जी मोरा मनवा तरसे ठाकुर जी
ओ ठाकुर मोरे दर्शन दे दो आज

दीन दुखी के पालन हारे सबके हो हितकामी 
प्रभु जन जन के हो स्वामी प्रभु जन जन के हो स्वामी
सब मिलकर राधास्वामी बोलो
राधास्वामी बोलो भक्तों राधास्वामी बोलो

ठाकुरजी मैं तोे अब नहीं जाऊं जी मोरा मनवा तरसे ठाकुर जी
ओ ठाकुर मोरे दर्शन दे दो आज

दीन दुखी के पालन हारे सबके हो हितकामी 
प्रभु जन जन के हो स्वामी प्रभु जन जन के हो स्वामी
सब मिलकर राधास्वामी बोलो
राधास्वामी बोलो भक्तों राधास्वामी बोलो




ठाकुर जी की बात ठाकुर जी की बात सारे जग को सुहाती है। 
सबका दुखडा मिटाती है ठाकुर जी की बात
पुरूषोत्तम प्रभु की बात

आर्त दुखी जन सारे आए तिहारे द्वारे दया की आस लिए।
द्वार से खाली हाथ कोई नहीं जाता सबकी सुद्ध लिए।।
पे्रम से उनकी प्रेम से उनकी जो ज्योत जगाते हैं।
उनका दुख वे मिटाते हैं ठाकुर जी की बात।।
पुरूषोत्तम प्रभु की बात

सुन प्रेम की वाणी आए जो संत ज्ञानी सबको साथ लिए।
सत्य जगाने को सद्भाव जगाने को जतन सब आप किए।।
भक्ति भाव के साथ भक्ति भाव के साथ जो दर पर आते हैं।
उनकी आस पुराते हैं ठाकुर जी की बात।।
पुरूषोत्तम प्रभु की बात

सभी को बचाने को सभी को बढाने को सतनाम जगाते हैं।
सतनाम की महिमा सतनाम की गरिमा सबको बताते हैं।।
दीक्षा के माध्यम से  दीक्षा के माध्यम से जग सुन्दर बनाते हैं।
सतनाम दिलाते हैं ठाकुर जी की बात।।
पुरूषोत्तम प्रभु की बात


चरणों में रख लेना ओ ठाकुर मोहे चरणों में रख लेना
चरणों में रख लेना

चरणों में तोरे सब तीर्थ हैं चरणों में तोरे सब तीर्थ हैं। 
चरणों में तोरे मोरे प्राण ओ ठाकुर चरणों में रख लेना।।
चरणों में रख लेना

चरणों में तोरे मात पिता हैं चरणों में तोरे मात पिता हैं 
चरणों में तोरे सब परिवार ओ ठाकुर चरणों में रख लेना।।
चरणों में रख लेना

चरणों में तोरे सब देवन हैं चरणों में तोरे सब देवन हैं।
चरणों में तोरे सब मुनिजन ओ ठाकुर चरणों में रख लेना।।
चरणों में रख लेना

चरणों में तोरे गंगा यमुना चरणों में तोरे गंगा यमुना।
चरणों में सब संसार ओ ठाकुर चरणों में रख लेना।।
चरणों में रख लेना




तोरी लीला तु ही जाने कोउ न जाने रीत। 
ओ ठाकुर मोरी सुद्ध लेना मोरे ठाकुर मोरी सुद्ध लेना।। 

कुल हैं उंचा रीत है उंची उंची तोरी प्रीत। 
ओ ठाकुर मोरी सुद्ध लेना मोरे ठाकुर मोरी सुद्ध लेना।। 

दीन जनों के पालन हारे मोरी भी लेना सुद्ध। 
ओ ठाकुर मोरी सुद्ध लेना मोरे ठाकुर मोरी सुद्ध लेना।। 

रात दिवस मैं मन में गाऊं तोरी छवि मन में ध्यावुं। 
ओ ठाकुर मोरी सुद्ध लेना मोरे ठाकुर मोरी सुद्ध लेना।। 

मन का दीवला जलता जाए दर्शन की नीत प्यास सतावे। 
ओ ठाकुर मोरी सुद्ध लेना मोरे ठाकुर मोरी सुद्ध लेना।। 

मैं मूरख और मैं अज्ञानी आया मोरे कूल के स्वामी।
ओ ठाकुर मोरी सुद्ध लेना मोरे ठाकुर मोरी सुद्ध लेना।। 




ठाकुर ठाकुर नाम बिना मुझे और नहीं कुछ भाता है।
सुनलो मोरे नाथ मुझको मार्ग नजर नहीं आता है।
ठाकुर ठाकुर नाम बिना मुझे

तोरा ठाकुर नाम पुकारू रात दिवस मैं पथ बुहारू।
कब आओगे ठाकुर मोरे कब आओगे नाथ।
बिगडी बनाओ नाथ मोरी सुनलो मोरे नाथ ।।
ठाकुर ठाकुर नाम बिना मुझे

इस जग के तुम पालन हार तुम बिन कोई न खेवनहार।
घट घट में रहने वाले लगाना नैया पार।
प्रभु अब आओ पार लगाओ सुनलो मोरे नाथ।।
ठाकुर ठाकुर नाम बिना मुझे

इस जग का सब झुठा चलन है मन कहीं नहीं लगता है।
तोरे दरस का मैं भिखाडी तोरे दर पर ही सुख मिलता है। 
प्यास मिटाओ पास  बुआओ प्रभु सुनलो मोरे नाथ।।
ठाकुर ठाकुर नाम बिना मुझे




हे सुख रंजन हे दुख भंजन तोरी करूणा परम अपार रे 
जग के हो करतार

बहुत दिनों से आस लगी थी कब तोरे दर पर आऊं।
ठाकुर मोरे कब तोरे दर पार आऊं।।
आकर जब मैंने तोहे देखा भूल गया सब काम रे। 
ठाकुर भूल गया सब काम ।।
हे सुख रंजन 

सतनाम का प्रभु जी जाप किया जब अन्दर तोहे पाया।
ठाकुर मोरे अन्दर तोहे पाया।।
अन्तर के तम दूर हुए ठाकुर पाई शक्ति अपार रे।
ठाकुर मोरे पाई शक्ति अपार।।
हे सुख रंजन 

जग को दिखाया अलग ही रूप से कैसी अद्भूत माया।
ठाकुर तोरी कैसी अद्भूत माया।।
सबही को तो अपना दिखाया कोई नहीं पराया रे।
ठाकुर कोई नहीं पराया।।
हे सुख रंजन 

शरण में अपनी हरदम रखना कभी न देना निसार।
ठाकुर कभी न देना बिसार।।
तुम ही मेरे पालन हारे तुम ही खेवनहार।
ठाकुर तुम ही खेवनहार।।
हे सुख रंजन 




ठाकुर जी तोरे दर पे कोई आया है दरशन की आशा मन में लाया है।
ठाकुर जी तोरे

जनमों से प्यासा मन ये मेरा है अन्धेरा ठाकुर बहुत घनेरा है।
मुझे अपना बनाओ शोक मिटाओ जी मन मेरा बहुत भरमाया है।
ठाकुर जी तोर

ठाकुर मोरे प्रभुवर मोरे ह्दय के मांही आओ।
ह्दय के मांही आओ ठाकुर ह्दय के मांही आओ।। 
ठाकुर मोरे प्रभुवर मोरे

और कहीं कुछ भी नहीं केवल लो सतनाम।
नाम नाम बस नाम नाम नाम बस नाम।।
दास हूं ठाकुर चरणों का तेरे लो मेरा प्रणाम।
लो मेरा प्रणाम ठाकुर लो मेरा प्रणाम।।
ठाकुर मोरे प्रभुवर मोरे

सुबह सवेरे हरदम मैं तो आऊं तोरे धाम।
आऊं तोरे धाम ठाकुर आऊं तोरे धाम।।
अपना बनालो शरण में लेलो ओ मोरे घनश्याम।
ओ मोरे घनश्याम ठाकुर ओ मोरे घनश्याम।। 
ठाकुर मोरे प्रभुवर मोरे


पुरूषोत्तम प्रभु खेवनहारे हो सुख के धाम।
हो सुख के धाम ठाकुर हो सुख के धाम।।
चरणों में तोरे ठाकुर मोरे पाया है विज्ञाम।
पाया है विज्ञाम ठाकुर पाया है विज्ञाम।।
 
ठाकुर मोरे प्रभुवर मोरे





नाम प्रभु का गाना है मुझे जीवन सफल बनाना है।
नाम प्रभु का गाना है प्रभु चरणों में जाना है।।

जीवन नैया आज बचाओ ठाकुर चरणों में मन लगाओ।
श्री चरणों में आना है मुझे जीवन सफल बनाना है।।
नाम प्रभु का गाना है मुझे

ठाकुर जी की महिमा भारी विपदाएं मिट जाती सारी।
उनकी दया को पाना है मुझे जीवन सफल बनाना है।।
नाम प्रभु का गाना है मुझे

पल पल प्रभु का नाम जपे जो श्री चरणों में शीश धरे जो।
भवसागर तर जाना है मुझे जीवन सफल बनाना है।।
नाम प्रभु का गाना है मुझे





नाम की लौ लगाना रे बन्दें भूल मत जाना।
भक्तों भूल मत जाना बन्दे भूल मत जाना।।
सतनाम की लौ लगाना रे

बिना  सतनाम जीवन कैसे पार तुम लगाओगे।
सतनाम की शक्ति पाकर जीवन पार तुम पाओगे।
सतनाम बिना सब जीवन सूना कैसे भव तर पाओगे।। 
बन्दे भूल मत जाना
सतनाम की लौ लगाना रे

मिलती शक्ति मिलती भक्ति माया हटती ।
सतनाम की शक्ति सबसे निराली मिलती जीवन मुक्ति।
सतनाम बिना सब जीव अधुरा कैसे भव तर पाओगे।।
 बन्दे भूल मत जाना
सतनाम की लौ लगाना रे

सतनाम के नामी हैं पुरूषोत्तम हैं धरती पे आए।
पाप पूण्य कबहुं न पूछे सबको करते हैं स्वीकार।
सबके मन को शीतल हैं वे खेवनहार।।
 बन्दे भूल मत जाना
सतनाम की लौ लगाना रे




ठाकुर जी तोरे दर का भिखाडी दर्शन करने आया हूं मैं 
दास बनालो पास बुलालो आशा मन में लाया हूं मैं।।
ठाकुर जी तोरे दर का भिखाडी

रात दिवस तोरा नाम जपुंगा जो तु देवे वो लेउंगा।
कुछ नहीं मांगु कुछ नहीं चाहुं दर्शन का प्यासा हूं मैं।।
ठाकुर जी तोरे दर का भिखाडी

सुबह सवेरे दर पथ तेरे झाडु बुहारूं फूल सजाऊं।
हाथ जोड प्रणाम करूंगा जो तु बोले वो ही करूं मैं।।
ठाकुर जी तोरे दर का भिखाडी

इस दुनिया में फिर नहीं जाऊं इतना आस पुराना मेरा।
तुझ बिन मेरा कोई नहीं है छोड अब कित जाऊंगा मैं।।
ठाकुर जी तोरे दर का भिखाडी

रूप अलौकिक ज्योत निराली देख देख मुग्ध होऊं मैं।
श्री चरणों की भक्ति लेकर कोटि कोटि जनम तरूं मैं।।
ठाकुर जी तोरे दर का भिखाडी


  कर पुरूषोत्तम को प्रणाम बन्दे बोल हरि हरि
बन्दे बोल हरि हरि बन्दे बोल हरि हरि
बोल हरि हरि बन्दे बोल हरि हरि
कर पुरूषोत्तम को प्रणाम

पुरूषोत्तम को जो ध्यावे उसका जनम सफल हो जावे।
ठाकुर चरणों को ध्यावे उसका जनम सफल हो जावे।
उसके बन जाते सब काम बन्दे बोल हरि हरि।।
बन्दे बोल हरि हरि

जो ठाकुर के दर पे आवे उसके पाप सारे मिट जावे।
जो पुरूषोत्तम द्वारे आवे उसके पाप सारे मिट जावे।
उसके कर्म होते निष्काम बन्दे बोल हरि हरि।।
बन्दे बोल हरि हरि

जो सतनाम की महिमा गावे वो भाव अनुठा पावे।
जो उनकी महिमा गावे वो भाव अनुठा पावे।
मिलता श्री चरणों में स्थान बन्दे बोल हरि हरि।।
बन्दे बोल हरि हरि



ठाकुर हैं रखवाले भव से पार लगाने वाले 
उनकी माया समझ न आय उन बिन रहा भी ना जाय।।
ठाकुर हैं रखवाले

ठाकुर जी की माया कहीं धूप कहीं छाया। 
लेते सबको ही बचाय करते पार लगाय।।
ठाकुर हैं रखवाले

मन को शीतल करते मन को उज्जवल करते।
जो कोई उनकी शरण में आय करते पार लगाय।।
ठाकुर हैं रखवाले

मनभावन रूप है उनका सुखकारक रूप है इनका।
जो कोई दर्शन करने आय करते पार लगाय।।
ठाकुर हैं रखवाले

पुरूषोत्तम प्रभु की वाणी लगती सबको सुखानी।
जो कोई मन को लगाय करते पार लगाय।।
ठाकुर हैं रखवाले



पुरूषोत्तम घट घट स्वामी मोहे पार लगाना जी।
बीच भंवर मेरी नैया डोले मोहे पार लगाना जी।
पुरूषोत्तम घट घट स्वामी

प्रभु जी तोरी सुन सुन बातें द्वार तिहारे आया जी।
दुख मेटो मोहे सुख देवो जी विनती मोरी सुणियो जी।।
बीच भंवर मेरी नैया डोले मोहे पार लगाना जी।
पुरूषोत्तम घट घट स्वामी

रात दिवस यही लगन लगाऊं कब आओगे घर पर जी।
मेरा घर और तोरा दर प्रभु होगा कब एक जी।।
बीच भंवर मेरी नैया डोले मोहे पार लगाना जी।
पुरूषोत्तम घट घट स्वामी

प्रभु पुरूषोत्तम प्रभुवर मोहे सुणलो मोरी अरजी जी
दर्शन करने दर पर आया विनती मोरी सुणियो जी।।
बीच भंवर मेरी नैया डोले मोहे पार लगाना जी।
पुरूषोत्तम घट घट स्वामी



ठाकुर दर पर तोरे आऊं मैं तो तोरी बाट लगाऊं। 
मैं तो जग सारा भुलाऊं मोरे ठाकुर जी ओ मोरे ठाकुर जी।
ठाकुर दर पर तोरे आऊं

तोरा रूप सुहाना लागे देख मनका दुखडा भागे।
रहना सदा मेरे आगे मोरे ठाकुर जी ओ मोरे ठाकुर जी।
ठाकुर दर पर तोरे आऊं

जबसे तोरी शरण में आयो जीवन अपना सुन्दर पायो।
परिवार सारो हरषायो मोरे ठाकुर जी ओ मोरे ठाकुर जी।
ठाकुर दर पर तोरे आऊं

आस मोरे मन आई तेरो नाम प्रभु सुखदाई।
मोरे मन में दो जगाईमोरे ठाकुर जी ओ मोरे ठाकुर जी।
ठाकुर दर पर तोरे आऊं





जनम जनम का ठाकुर तेरा पुजारी। 
श्री चरणों में जगह देना ठाकुर तेरा पुजारी।।
जनम जनम का ठाकुर

आशा एक ठाकुर लेकर दर पर तोरे आया हूं।
जीवन मोरा पूरण करदो यही भाव लाया हूं।
मन में बसी प्रभु छवि न्यारी ठाकुर तेरा पुजारी।।
जनम जनम का ठाकुर

मन में सुन्दर भाव देना घर को सुन्दर बनाऊंगा।
घर बार परिवार दर पर तोरे लाऊंगा।
कुटुम्ब कबीला सारा मैं तो लाया भारी तेरा पुजारी।।
जनम जनम का ठाकुर

प्रभु पुरूषोत्तम ठाकुर मोरे मन को भाते हैं।
उनकी सुरतिया देख देख विपद मिट जाते हैं।
उनकी दया से शान्ति मन में आए भारी तेरा पुजारी।।
जनम जनम का ठाकुर




शान्ति के दाता परम विधाता तोरी महिमा अपार शरण में ले लेना।
ले लेना ठाकुर ले लेना शरण में अपने ले लेना।।
शान्ति के दाता परम विधाता

सबके काज संवारते मंगल सबका करते हो।
सब जन मिल पुकारते विपदा सबकी हरते हो।।
मन शीतल करते निर्मल करते। 
तोरे रूप ज्योति अपार शरण में ले लेना।।
शान्ति के दाता परम विधाता
शुन्दर रूप तिहारा प्रभु मन भावन अति प्यारा है।
जो कोई दर पर आया प्रभु परमारथ वो पाया है।
मन शीतल करते निर्मल करते। 
तोरे रूप ज्योति अपार शरण में ले लेना।।
शान्ति के दाता परम विधाता
श्वास श्वास में तेरा नाम प्रभु मुझमेें समा जाए।
ऐसी करूणा करो प्रभु तोरे चरणों में जीवन लग जाए।।
मन शीतल करते निर्मल करते। 
तोरे रूप ज्योति अपार शरण में ले लेना।।
शान्ति के दाता परम विधाता
पुरूषोत्तम प्रभु जगपालक सृष्टि के पालनहार हो
तुम्हे समर्पित है मेरा छोटा सा संसार है।
मन शीतल करते निर्मल करते। 
तोरे रूप ज्योति अपार शरण में ले लेना।।
शान्ति के दाता परम विधातार्र्र्र्र्र्र्र्र्र्




तोहे सुमिरकर ठाकुर मैं तर जाऊं 
तोरे चरणों की भक्ति पाऊं ठाकुर मैं तर जाऊं 
तोहे सुमिरकर ठाकुर

जग के आधार तुम जग के पालनहार हो।
मेरी नैया डगमग डोले तुम्ही खैवनहार हो।
तोरे चरणों में ठाकुर शरण पाऊं ठाकुर मैं तर जाऊं।।
तोहे सुमिरकर ठाकुर


नजर जब उठाते तुम करूणा बरसाते हो।
लाखों लाखों लोंगो की विपदा मिटाते हो।
तोरे चरणों में ठाकुर शक्ति पाऊं ठाकुर मैं तर जाऊं।।
तोहे सुमिरकर ठाकुर


जग से मैं हारा ठाकुर शरण तिहारी आया हूं।
द्वार पर तोरे आकर प्रभुजी शान्ति पाया हूं।
तोरे चरणों में ठाकुर सुख पाऊं ठाकुर मैं तर जाऊं।।





तोरे नाम की महिमा अपार ठाकुर करना बेडा पार।
ठाकुर कर देना ठाकुर कर देना
तोरे नाम की महिमा 

तुझपे वांरा जीवन सारा तुझपे वांरा जीवन सारा ।
तोरे रूप से जग उजियारा तोरे रूप से जग उजियारा।
मोरा कर देना उद्धार ठाकुर करना बेडा पार।।
तोरे नाम की महिमा 

जन जन का है मंगलकारी जन जन का है मंगलकारी। 
नाम जपे जो होत सुखारी नाम जपे जो होत सुखारी।।
भव से लगाना पार ठाकुर करना बेडा पार।।
तोरे नाम की महिमा 

तोरे रूप से आभा झलके तोरे रूप से आभा झलके।
चमचम तोरा मुखरा चमके चमचम तोरा मुखरा चमके।। 
देऊं तोरी नजर उतार ठाकुर करना बेडा पार।।
तोरे नाम की महिमा 





ठाकुर तोरे दर्शन की ठाकुर तोरे दर्शन की। 
मुझे चाह अति भारी ठाकुर तोरे दर्शन की।।
ठाकुर तोरे दर्शन की

मैं कैसे दूर रहुं तोरी याद सताती है।
मैं जितना नाम करूं तेरी चाह बढ जाती है।।
तोरा रूप जो दिख जाए तोरा दरश जो मिल जाए। 
मेरा मन ये खिल जाए।।
ठाकुर तोरे दर्शन की

तोरी सुन्दर वाणी को मैं जितना मनन करूं।
मन नहीं अघाता है मैं जितना जतन करूं।।
तु सामने हो मेरे तु सामने हो मेरे। 
मेरा मन ये हरख जाए।।
ठाकुर तोरे दर्शन की

मेरे पास में आना प्रभु मुझे ना बिसराना प्रभु।
मुझे अपना बनाना प्रभु मुझे भूल न जाना प्रभु।। 
तु बिसर गया मुझको गर भूल गया मुझको।
तो मैं कभी ना सम्भल पाऊं।।
ठाकुर तोरे दर्शन की


जनम जनम मैं शीश झुकाए खडा रहुं तोरे द्वार पे।
ठाकुर जी मेरे मन में आया आज तोरे द्वार पे।।
ठाकुर जी मेरे मन में आया

श्याम सुन्दर नटवर नागर लखाया तोरे द्वार पे।
शिव शंकर भाले भंडारी लखाया तोरे द्वार पे।
सुध बुध अपनी मैं तो खोया आज तोरे द्वार पे।।
ठाकुर जी मेरे मन में आया

राम रसूल प्रभू इशु लखाया तोरे द्वार पे
पुरूषोत्तम प्रभु में सबको पाया आज तोरे द्वार पे।
ढाकुर जी में सबको पाया आज तोरे द्वार पे।।
ठाकुर जी मेरे मन में आया

प्रभु पुरूषोत्तम सर्वेश्वर मेरे रहुं सदा तोरे द्वार पे।
हर घडी तोरा गुण गाऊं खडा रहुं तोरे द्वार पे।
आस अपनी यही मैं लाया आज तोरे द्वार पे।।
ठाकुर जी मेरे मन में आयार्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्



धरती का ताप मिटाने पुरूषोत्तम धरा पर आए।
आगे बढो चरण पडो सब पुरूषोत्तम धरा पर आए।
धरती का सब ताप मिटाने

रोग शोक से व्याकुल सब जन कोई न शांति पाता। 
दीन जनों और निर्बलों को कोई न राह दिखाता।
आर्त जनों के त्राण हरने पुरूषोत्तम धरा पर आए।
धरती का ताप मिटाने

जल वायु सब दुषित भए हैं धरती का मन प्यासा।
अन्न वन उपवन भए विषैले हुआ जीव उदासा।
जग अपना सम्भालने वाले पुरूषोत्तम धरा पर आए।
धरती का ताप मिटाने

सबके मन मैले हुए हैं घर घर हिंसा आई।
कोई अपना आज नहीं कोई सगा न भाई।
मन में फिर से प्रेम जगाने पुरूषोत्तम धरा पर आए।
धरती का ताप मिटाने
विकास के नाम पर प््रााणियों ने कैसी दुनिया बसाई।
प्रकृति की सुन्दर संपदा की कैसी दशा बनाई।
अपनी धरा संवारने पुरूषोत्तम धरा पर आए।
धरती का ताप मिटाने




मोरे हो तुम खेवनहार………हो मोरे देवा ……।
तुम बिन न कोई आधार ………।।
यह जग है इक भ्रम की माया निकल न पाते हम।
सांसो का बस आना जाना जीवन का है अम्त।
करलो मुझको स्वीकार हो…मोरे देवा…………। 
तुम बिन न कोई आधार …………।।
सूना था मेरे दिल का कोना ज्योत जगाए तुम।
विश्राम दिया जीवन को ऐसा जब चरणों में आए हम।
रखना तुम हमको सम्भाल हो… मोरे देवा………।
तुम बिन न कोई आधार ………।।
 इक इक सांस में तुझे पुकारूं मति देना ऐसी।
चरणों की प्रभू धूल बनपाऊं सुमति देना ऐसी।
अंत में देना न बिसार…हो मोरे देवा ………।
तुम बिन न कोई आधार ………।।






सर्वोत्तम पुरूषोत्तम प्रभु कोई न तुमसे उत्तम।
सर्वोत्तम पुरूषोत्तम,  प्रभु कोई न तुमसे उत्तम।

प्रभु  दीन दुखी के सहारे हो। भक्तों के नैन के तारे हो।
ज्योतिर्मय जग को बनाने। बन आए तुम नरोत्तम।।

प्रभु  सदियों से तुमकोें ढूंढ़ रहे। अब तक क्यूं मुझसे दूर रहेऋ
दया  अपनी बरसादो। तेरे चरणों में आए हम।।

मैं जब भी पुकारूं आना प्रभु,  नहीं मुझको भूल न जाना प्रभु 
है जनम जनम का रिश्ता। नहीं दुनिया में खो जाएं हम।।




मनवा प्रभू आए तेरे द्वार. मनवा प्रभू आए तेरे द्वार।

मन की पीडा धर चरणों में. सुनेंगे बारम्बार।

जिस जीवन को दिया प्रभू ने. आए उसको सम्भाल।

जप तप साधन कुछ भी न मांगे. मांगें केवल प्यार।

जीवन पथ को रौशन करले. मौका मिला इस बार।





सुरतिया हुई आज निहाल। सुरतिया हुई आज निहाल।।

इन नैनों ने दरशन पाया. मन न होत सम्भाल।

मन के द्वार में प्रगटे प्रभूजी. मिला चैन सब भांत।

ज्ञानी ध्यानी पार न पाए. फंसे भ्रम की जाल।

श्री चरणों में प्रीत लगाई. हुआ ये कैसा कमाल।







नमन करू मैं बारम्बार नमन मैं करू बारम्बार

हे परमेश्वर हे जगदीश्वर खडा हूं तेरे द्वार।

कोटि जनम के बाद हे स्वामी पायो दर्शन आज।

हे जग स्वामी अन्तर्यामी पायो न तेरो पार

कण कण में प्रभू छवि तुम्हारी ये जग है आजार

जप. तप. साधन कछु भी न जानूं शरण में लेलो आज

चरणों में अपन रखलो मुझको हो मेरा निस्तार





अभिनन्दन अभिनन्दन प्रभू बार बार अभिनन्दन

प्रभू जबसे तुमको पाया तब हटा तम का साया
करूं हर पल वन्दन प्रभू बार बार अभिनन्दन

पूजा की विधि ना जानूं.  मैं सेवा की विधि ना जानूं।
जग बना शीतल चन्दन प्रभू बार बार अभिनन्दन




जो प्रेम जगाया है चित्त में उस प्रेम की रक्षा तुम करना।
मैं निर्बल और अज्ञानी हूं मेरे प्रेम की रक्षा तुम करना।।


यह जीवन तुमको अपिर्त है।सुख संसार समर्पित है। 
जो प्रेम की डोरी बांधी है उस डोरी की रक्षा तुम करना।।


श्री चरणों में ध्यान रहे।मुझे और न कोई ज्ञान रहे।।
जो भाव जगाया है चित्त में उन भावों की रक्षा तुम करना।।


मेरी सांसें जबतक तन में रहें।तेरे दरश की आशा मन में रहे।।
जो प्यास जगाई जीवन में।उसकी तृप्ति सदा ही तुम करना।। 





प्रभू कैसी प्रीत जगाई…

अंतर के तम दूर हुए और. विरह की अग्नि समाई।

मन ये मेरा तुझे पुकारे और न कछु अब भाई।


निश दिन तेरी बाट निहारूं. कब आओगे कन्हाई।


नैन बिछाए कबसे खडा हूं. कब आवोगे सांई।






कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि  अहं नमामि नमामि  अहं नमामि 

गणनायक वरदायक देवा।तुमही भजहिं मिटेही संदेहा ।     
वाणी देऊ मोहे तुम ऐसी।करूं गुनगाण  भव भयहर की ।।

मात सरस्वती कृपा मोपे कीजे।हंसवाहिनी सद्बुद्धि दीजे ।
अवगुण मोरे क्षमा मां कीजे।गुणगाऊं प्रभू की वाणी दीजे ।।

औढ़रदानी अलख निरंजन।शीश गंग भक्तजन मन रंजन ।
करऊं प्रणाम प्रभू पूरणकामा।आशीश देऊ प्रभू सर्व सुखधामा ।। 

जय हनुमंत संत हितकारी।तुम बिन कौन मोर उपकारी ।
आशा एक मोरे मन माहीं।अपने “गुरू” को देखउं तुम्ह नाईं ।।

‘गुरूवर’ मोहे शुभ दृष्टि देओ।तोहे निहारूं दिव्य चक्षु देओ।
“राधा  राधा” हरदम गाऊं।“राधा” में स्वामी मिल जाऊं ।। 

आप हो “स्वामी” जग रखवारे।कोटि कोटि जन तुमहि निहारे ।।
द्वार तिहारे जो कोई आवे।वो जन निश्चलता पुनिः पावे ।।
।।बोल हरि।।

कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि  अहं नमामि नमामि  अहं नमामि 

।।बोल हरि।।
कलि के फैले संताप से. नर सब होय अघाय । 
पूछ रहे ‘हे परमपुरूषॐ  आखिर कौन सहाय।।
हर तरफ अंधकार है. विकल खडे सब लोग । 
चहुं दीशा भयभीत है. सुझत न कोई योग।।
क्या ऐसा कोई वीर है. मनुज का हरे संताप । 
मानव जीवन धन्य हो. धन्य हो धरणी आप।।
ऐसा मानव हे प्रभू. प्रगट हुआ जग माहीं । 
जिसको पाने से मिटे. सब संताप निज माहंी ।।
प्रभू की रीत बता रहे. स्वयं विधाता निज मुख । 
अघात होता नर जभी. रहता नहीं कोई सुख।।
ईश्वर निज आसन में. रहने न पाते आप ।
लेकर रूप मनुज का. हरने को संताप ।।
कलयुग का आधार है. जो अनामी नाम ।
आ चुके वे परमपुरूष. लेकर नाम को साथ।।
।।बोल हरि।।


कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि  अहं नमामि नमामि  अहं नमामि 
।।बोल हरि।।
सुनो मनुज मैं बात सुनाऊं।प्रभू के रीत की कथा सुनाऊं।
लखि न जाए इन नैनन से।कथा सुनो सब मन चितवन से।।
।।बोल हरि।।
परमपुरूष रहते वहां हैं।सबसे उपर लोक जहां है ।
                                            समस्त लोक का पालनहारा।दयाल देश में रहता न्यारा।।                                                                                           
।।बोल हरि।।
सूरत भी पहुंचे न वहां पर।परअक्षर ब्रह्य रहें जहां पर।
अपने कुल की रीत बचाने।कुल मालिक चले राह दिखाने।।
।।बोल हरि।।
सहस्त्रसार उपर कई लोका।त्रिकुटी शून्य महाशून्य भ्रमर लोका ।
                                    सर्तअलख अगम अकह लोका।सबसे उपर राधास्वामी लोका।।                                                                                                                                                                                     
।।बोल हरि।।
मानवता को फिर से जगाने।अपने कूल की लाज बचाने ।
दयाल देश से आए स्वामी।जन जन के हैं अन्तर्यामी।।
।।बोल हरि ।।


दोहा 
 हुई खबर सब ओर देवखडे कर जोड । 
चहुं दिशा कंपित हुई कांप उठे सब लोक।।
देव सभी चल पडे बल अपना सम्भाल । 
पथ लगे बुहारने रहे वे बाट वे निहार।।

।।बोल हरि।।
मां मनमोहिनी अति सौेम्यमयी।बाल्यकाल से थी तेजोमयी ।
मात पिता से हठ वे करती।कृष्ण मंत्र का जाप वे चाहतीं ।।
।।बोल हरि।।
रात दिवस यही लगन लगाई।कब आवें श्री कृष्ण कन्हाई।
मां राधे मोहे दर्शन दे दो।मुझको प्रभु की दीक्षा दे दो ।।
।।बोल हरि।।
राधे राधे गोबिन्द मिलादे।महामंत्र की भिक्षा देदे ।
विकल होय कर प्रार्थना करती।मन ही मन उपासना करती।।
।।बोल हरि।।
पिता समझाने लगे कन्या को।बाल्यपन में न मिला किसी को।
सुध बुध भूली इक रात में।विह्ल हो उठी मूर्ति पास में।।
।।बोल हरि।।
मात पिता फिर फिर समझाते।रात में ठाकुर शयन हैं करते।
रात्रि में जिस दिन वे जगेंगे।स्वयं तुम्हें वे मन्त्र देवेंगे।।
बाट जोहती रही वो कन्या।मन्त्र देवेगा कब कृष्ण कन्हैया।
छ वर्ष की व्याकूल हो गई।बालपना का खेल भूल गई।।6।।
।।बोल हरि ।।

दोहा
हर क्षण हर घडी वो कहती. जपती सुबह और शाम ।
रात रात वो जागती. कृष्ण मुर्ति के पास।।
अर्धरात्रि में एक दिन. हुई अचम्भित बात । 
प्रभू मूर्ति चैतन्य हुर्इ.. प्रगटी रश्मि अपार।।
देखती रही मनमोहिनी. लगी टकटकी लगाय । 
उज्जवल ज्र्योितर्मय छवि. दिव्य प्रकाश झलकाय।।
प्रगट हुए इक संत पुरूष. प्रकाश पुंज के साथ ।
 मनुॐ तुझे क्या चाहिए? मूर्ति से हो रहा नाद।।
शुद्ध बुद्ध भूली बालिका. चरणन मेें चित्त लाय । 
मंत्र मंत्र मुझे चाहिए. बही अंसुवन की धार।।
उदात्त धीर स्पष्ट स्वर. गुंज उठा इक नाद।
झंकृत हो रहा तन मन. मिला अनामि नाम।।
राधायुक्त चतुष्ट्य मंत्र. प्राप्त किया सस्वर। 
धन्य है वो पावन घडी. धन्य वो परम अक्षर।।

।।बोल हरि।।


चौपाई
मात पिता सुनी सब बातां।विह््ल हुए मन नहीं अघाता।
कन्या दिन दिन बढती जाए।महामंत्र वो रटती जाए।।1।।
।।बोल हरि।।
कछुक समय बीते एहीं भांति।रहती मगन कन्या दिन राति।
मात पिता दोनों बतलावे।मिले सुपात्र विवाह हो जावे।।2।।
।।बोल हरि।।
शांडिल्य गोत्र पबना के वासी।ईश्वरचन्द्र गृहस्थ सन्यासी ।
दानी सुत शिवचन्द्र विशेषा।आदर्श नेमी सरल लवलेषा।।3।।
।।बोल हरि।।
दृढ नियम अतीथि सत्कारा।देखें सबमें प्रभू को प्यारा।
प्रत्यक्ष की पूजा पहले करना।हरदम उनका ऐसा कहना।।4।।
।।बोल हरि।।
जो जन आते उनके निवासा।पाते  शांति मिटता कलेषा।
दानवीर सत्भाषी महेषा।रहते सहज भाव निज देशा।।5।।
।।बोल हरि।।
शुभ समय लगन जब आया।मनु को पत्नीरूप में पाया ।
लीला कहीं कुछ और हो रही।प्रकृति अपना खेल रच रही।।
।।बोल हरि ।।
प्रभू की रीत निराली है. न्यारे उनके काम ।
मां बनी मनमोहिनी. पिता शिवचन्द्र महान् ।।
।।बोल हरि।।

दोहा
हाथों से निज सेवा करतीं।अविरल मंत्र निशदिन वो जपती ।
जान सकी न प्रभू की रीती।धरणी पर गुरू स्वप्न की मूर्ति ।।
।।बोल हरि।।
एक दिवस कुछ ऐसा आया।मनु ने गुरू को सन्मुख पाया।
पुलकित नैन अश्रु भर आए।स्वप्नदृष्ट गुरू सन्मुख पाए।।
।।बोल हरि।।
कह न सकी कुछ मुख से वाणी।अपलक देखती रही वो रानी ।
आसन से बोली गुरू मूर्ति।मां सुशीला आवाज ये गुंजी ।।
।।बोल हरि।।
मां तेरे घर मालिक आएं।धरती का भार स्वय्ां उठाएं ।
विस्मित हुई सुन गुरू की वाणी।समझ सकी ना कछु भीे स्यानी ।।
।।बोल हरि।।
बहुत पसारा दुर्जनों का।नहीं किनारा सद्जनों का।।
खल बल शक्ति से घिर आते।वधू कन्या पर वार वे करते ।।
।।बोल हरि।।
दल बल अत्याचार वे करते।न्याय प्रिय हो न्याय वे करते ।
सहमे थे सब सज्जन लोगा।खडे पुकार बहुत मन योगा ।।
।।बोल हरि ।।

दोहा
जाति भेद प्रबल था आहत था सद् समाज। 
विकल हो रहे लोग सब सहमे गृह के माय।।

।।बोल हरि।।

चौपाई
अन्तर्द्रष्टा गुरूवर ग्यानी।त्रिकाल के हैं वे विज्ञानी।
गुरू की बात मनु मन माहीं।बैठ गई कछु सुध बुध नाहीं।।
।।बोल हरि।।
उदार ह्दया तेजस्वनी बाला।नाम में लीन हुई सब काला।
सतत जाप गुरू मंत्र का करती।मधूसूदन के आसरे रहती।।2।।
।।बोल हरि।।
आर्त स्वर में अंतःस्तल से।हर घडी जपती हर पल क्षण में।
आर्त हो जब  भक्त बलाए।निराकार प्रभू शिशु बन आए।।
।।बोल हरि।।
जब प्रभू आए मात गर्भ में।प्रगटी आभा मां के तन में।
                                          दिन दिन बढती जाए स्फूर्ति।माता ज्यों बनी विशिष्ट विभूति।।                                                                                              
।।बोल हरि।।
साधू समाज घिर घिरकर आते।अनजाने रहस्यों को बताते।
माता तू है बडी बडभागन।दिव्य किलकारी गुंजे तेरे आंगण।।
।।बोल हरि।।
नभ में देव गण करें प्रार्थना।पूरी होगी सकल कामना।।
सब मिलकर गुणगान हैं करते।प््राभू आने की बाट हैं जोहते।।
।।बोल हरि ।।


दोहा
धरती मन मन ध्या रही. नमन करें सब लोक।
करे वन्दना सरस्वती. खडे देव कर जोड।।

।।बोल हरि।।

चौपाई
।।बोल हरि।।
                            वायु मन्द मन्द यूं बहती।स्निग्ध सुशीतल मन को करती।                                     
पक्षी नीड पर कलरव करते।हरि आवन की घोषणा करते।। 
।।बोल हरि।।
                                    बाजी चहुं शंख शहनाई।देवी देवता दुदुंभी बजाई।                                        
जहं तहं मगंल गान हो रहे।भांत भांत के पुष्प खिल रहे।। 
।।बोल हरि।।
                                    हरिबोल सब ओर गुंज रहे।स्नेहित मन सब विह््ल हो रहे।                                      
धरती नभ जल हरषित होते।बहु बिध सब जन पूजा करते।। 
।।बोल हरि।।
                            हर्षित हो रहे जग लोका।नाम के नामी आए लोका।                                 
ऋषि महिर्षि निज आसन माहीं।हरि आए अब चिंता नाहीं।। 
।।बोल हरि।।
    गृह प्रांगण हुए आलोकित।सबके ह्दय हो रहे पुलकित।                    
भादो महीना बहुत ही पावन।प्रभात की बेला अति मन भावन।। 
।।बोल हरि।।
ताल नौमी शुक्रवार विशेषा।आए पालक जग के महेशा।                          
प्रातः सात पांच मीनट पर।अवतीर्ण हुए प्रभू धरणी पर।।
।।बोल हरि।।

।।बोल हरि ।।

दोहा
सारा लोक आलोक हुआ. आए कूल के नाथ। 
धरणी का भार उतारने. शक्ति को ले साथ।।
विप्रों ने किया नामकरण. नाम हुआ अनुकूल। 
श्री श्री ठाकुर नाम से. हुए जगत के पूज्य।।

।।बोल हरि।।









चौपाई
सर्व शरीर सुगठित ऐसा।तेज तपोबल विद्युत जैसा।
गौर वदन तपे स्वर्ण की भांति।लम्बी भुजाएं देती विश्रांति ।।
।।बोल हरि।।
कमल नयन मुख उनके सोहे।सुन्दर ऐसे मन को मोहे।
अद्भूत बालक आया घर माहीं।रूण झुण पैजनी बाजी पग माहीं।
।।बोल हरि।।
कभी धरणी पे बैठे झूला। दिन दिन बढे शिशु अनुकूला।
मोहित मात मन माहीं होती। झांकी पे न्योछावर होती ।।
।।बोल हरि।।
हर दिन लीला होती बहु भांति।माता भी कुछ समझ न पाती।
घुटनों के बल चल रहे ऐसे। जगपालक बालक के जैसे।।
।।बोल हरि।।
कोमल चरण भूमि पे धरते।दसों दीशाएं जयजय  करते।
परिजन सबजन नयन भर तकते।शैशवलीला ह्दय में भरते।।
।।बोल हरि।।
आसपास के लोग सब आते।बाल लीला को देख अघाते।
कोई कहे नटखट बालक है।कोई कहे ये कुल मालिक है।।            
।।बोल हरि।।

कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ
।।बोल हरि।।
मात मनमोहनी बहुत उदारा।अनुशासन उन्हें सबसे प्यारा।
पुत्र है अनुपम कहते लोगा।ईश्वरीय शक्ति भांति सब जोगा।।
।।बोल हरि।।
अन्नप्रासन का अवसर आया।बहुत प्रकार मोद मनाया।
सजी यात्रा बहुत प्रकारा।बालक माहीं लगा अति प्यारा।।
।।बोल हरि।।
मंगलगान बहुं भांति होरहा।अन्नप्रासन विधान होरहा।
रूप माधुरी बालक मुख चमके।विद्युत भांति सब अंग अंग दमके।
।।बोल हरि।।
झलक पाने होड सब करते।मन में प्रेम विशेष हैं धरते।
बारम्बार लोग सब निहारें।ह्दय मांही कुछ और बुहारे।।
।।बोल हरि।।
नाना प्रकार उत्पात वे करते।नित पडोसी उलाहना देते।
माता जबजब करती रोषा।पडोसी कहते अनुकूल नहीं दोषा।।
।।बोल हरि।।
दिव्य लीला करते दिन राति।अनुपम चरित्र दिव्य बहुं भांति।
सबके मन को मोहते ऐसे।गगन में चंदा चकोर को जैसे।।
 ।।बोल हरि।।
       
  
।।बोल हरि ।।

दोहा
कभी बाग उजाडते. खेलते पंक्षी के साथ। 
मन्दिर में जा लेपते. चंदन अपने माथ।।
वाणी बोलते जो जिसे. सच्ची होती हर भांत। 
सब विस्मित रह जाते. सुन बालक की बात।।

।।बोल हरि।।

।। जन्मलीला प्रसंग सम्पूर्णम्।।








कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ
।।बोल हरि।।
 ठाकुर हमारे धरणी पर आए।आर्त दुखी जन शांति पाए।
शांति के दाता परम विधाता।नाम सुमिरकर सतपथ पाता ।।1।।                                                                                                                                            
।।बोल हरि।।
ब्रह्या बिष्णू और महेशा।संग रहते ठाकुर के हमेशा।                                                                             
जीवंत इष्ट ठाकुर को जानो।परम तत्व का भेद तुम मानो।।2।।                                                                
।।बोल हरि।।
परम पुरूष को जो जन जाने।ईश्वर की लीला  पहचाने ।                                                                      
धर्म क्या है जानो तुम बन्दे।कर्म की गति पहचानो बन्दे।।3।।                                                                   
।।बोल हरि।।
शिव ठाकुर में भेद नहीं है।जहां ठाकुर हैं वेद वहीं है।                                                                             
वेद वाक्य है उनकी वाणी।दया मिले तर जाए प्राणी।।4।।                                                                
।।बोल हरि।।
ठाकुर को जो शिव जी माने।शिव ठाकुर में भेद न जाने।                                                                           
उन भक्तों की बात निराली।ईष्ट के बल पे करे रखवाली।।5।।                                                                     
।।बोल हरि।।
परम दयाल वे कहलाते।परम मार्ग है वो दिखलाते।                                                                                
परम प्रभू परमेश्वर वो हैं।विश्वेश्वर हैं जगदीश्वर हैें।।6।।
।।बोल हरि।।

कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ
।।बोल हरि।।
 सत् आचार्य की महिमा बताई।कुर्लमालिक कुर्लरीत समझाई।                            
 सद्गुरू ही आचार्य देव हैं।श्रीचरणों में पूर्ण होते यज्ञ  हैं।।1।।               
     ।।बोल हरि।।
आचार्यदेव में सबका वास है।शक्तियां सारी रहती आप है।                                      
 जीवन दीप्त होता है 
उसका।आचार्य देव को जो है धरता।।2।।          
         ।।बोल हरि।।
आचार्य ही तो चलन बताए।वे आचार पर चलके दिखाए।
आज्ञा में चलना उनके निर्शदिन।बंधन सारे मिटते पल क्षिण।।3।।                    
।।बोल हरि।।
कर्मयज्ञ में तपकर रहते।सबको कर्म में तपा कर चलते।                                   
 उनकी परमशुद्ध आभा से प्राणी।भक्ति भाव से हो निष्कामी।।4।।                 
।।बोल हरि।।
उनके रूप तेज की ज्योति।उनके चरर्णरज जैसे मोति।                                 
वेद से उंची उनकी बाणी।निर्भय रहते निज अनुगामी।।5।।                                   
।।बोल हरि।।
घट घट में वो रमने वाले।सबके घट का भेद वो जाने।                                        
सबकी मेटते है वो पीडा।आए उठाने सबका बीडा।।6।।

कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ
।।बोल हरि।।
श्रुति में जगते. श्रुति में वे रमते।हर घडी निज रूप में रहते।                                                               कारण पुरूष हैंॐ वे जग पालक।हैं सतचालकॐ हैं सतचालक।।1।                                                          ।।बोल हरि।।
करो समर्पित दुख जीवन के।स्वीकार करेंगे हर्षित होके।                                                                     चित्त को भ्रमित न होने देंगे।सहज मार्ग स्थिर कर देंगे।।2।।                                                                                                                 ।।बोल हरि।।
ब्रह्य स्वरूपिणी उनकी मूर्ति।जगालो मन में प्रभू की ज्योति।                                                            
 राह पे सबके साथ चलेंगे।बिघ्न बाधा सबकी हरेंगे।।3।।                                                   
।।बोल हरि।।
अन्तर्मन से उनको पुकारो।जीवन अपना आज संवारो।                                                                     ठाकुर युग के प्राण आधारे।सुमिरण करलो पाओ पारे।।4।।                                                                       ।।बोल हरि।।
ठाकुर ठाकुर मन जब गाए।ठाकुर सांस की डोरी चलाए।                                                                    आज्ञा में तुम चलना निशदिन।निज तत्व में रमना नितदिन।।5।।                                                                         ।।बोल हरि।।
जीवन सबका तभीे बढेगा।निज धर्म पर जब वो चलेगा।                                                                      जानो पहले धर्म की नीति।निज कल्याण की यही है युक्ति ।।6।
।।बोल हरि।।

कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ

काल चक्र अब ऐसा आया।चारों ओर मनुज भरमाया।                                                                                                    पग पग पर है तेरे अन्धेरा।कौन जाने कब हो न सवेरा।।1।।
।।बोल हरि।।
जाति विकास क्यों रूका तुम जानो।ठाकुर जी की बात तुम मानो।                                                                  सत्ता को जबसे अपघात किया है।जाति पे आघात किया है।।2। 
।।बोल हरि।।
किया विसर्जन पूर्वों की नीति।अनिष्टकारी तेरी सब प्रीति।                                                                        मोल तुमको चुकाना होगा।जाति का कर्ज निभाना होगा ।।3।।                                      
।।बोल हरि।।
कैसी नीति आज बनाई।पूर्वजों की आन गंवाई
जाति बैशिष्ट्य का मर्म तुम जानो।अपने गौरव की बात तुम मानो।                                                   
    ।।बोल हरि।।
जाति गुणों को उपर लाओ।सतनाम से शक्ति जगाओ।                                                                     रक्त के अपने तेज को जानो।पूर्वजों के गुण को मानो। ।5।।      
।।बोल हरि।।                                                                                                                                  जाति पर जब घात है होता।निज तेज का धार कम होता।                                                                        मर्यादा भी बचने न पाती।निज आभा भी तेरी जाती।।।6।।

कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ
।।बोल हरि।।
गौरव अपना बचाना है तो।जाति धर्म निभाना है तो।                                                                        सत्ता को अपने आज जगालो।ठाकुर से सब सद्गुण पालो।।1।।                                                                          
।।बोल हरि।।
गरिमा में तुम्हे जीना है तो।निज निष्ठा में रहना है तो।                                                                      वर्णाश्रम बचाना होगा।स्वधर्म पे सबको चलना होगा ।।2।।                                                        
।।बोल हरि।।
भौतिकता का राग न गाना।सत्य की ज्योत मन में जगाना।                                                                                                      अपने मन को उंचा उठाओ।अन्तर शक्ति को तुम पाओ।।
।।बोल हरि।।                                                            
 मात तु ही है घर की लक्ष्मी। अपना लक्ष्य क्यों भूली लक्ष्मी।                                                                                                           लक्ष्य अपना तुम जानो पहले। निज गल्ती को मानो पहले।।4।।                                                             ।।बोल हरि।।
तुमने भूला सत् आचार को।तुमने भूला कूल आचार को।                                                                                                    अनहोनी क्यों हर दिन होती।अशान्ति क्यों तेरे घर रहती।।5।।                                                              ।।बोल हरि।।
सुर्य उदय पर क्युं सावे नारी।बिगडती उसकी आभा सारी।                                                                                             लक्ष्मी जाती ब्याधि आती।माया अपना जाल बिछाती।।6।।








।।बोल हरि।।
कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ 
।।बोल हरि।।
बिना नित कर्म जो भोग बनाती। घर में बहुरोग है लाती।                                                                                                      जो नर भोग खाते हैं ऐसा।मन बिडता उनका वैसा।।1।।  ।।बोल हरि।।अन्न से उनका मन बिगडता।सारा दिन वैसा ही चलता।                                                                                                      उनकी शक्ति दिन दिन खोती। उनकी आय में हानि होती।।2।।                                                       ।।बोल हरि।।तुम्हारा सुख तो पति पुत्र से।तुम्हारा सुख तो परिजनों से।                                                                                                          अन्न उनको ऐसा खिलाओ।उनके अन्दर तेज जगाओ।।3।।                                                          ।।बोल हरि।।तेज बढेगा आभा बढेगी।सत आभा ही असत हरेगी।                                                                                                       दिन दिन उनकी ख्याति होगी।अनहोनि सब दूर रहेगी।।4।।                                                                ।।बोल हरि।।पत्नी की स्वामी में भक्ति हो जैसी।संतान उनको मिलती है वैसी।                                                                सुंसतान को पाना होगा।सुसंस्कार बचाना होगा।।5।।                                                               ।।बोल हरि।।सुसंतान को धरा पर लाओ।जग को सुन्दर तुमही बनाओ।                                                                    संतानों में सदाचार जगाओ।उनको निष्ठावान बनाओ।।6।।
।।बोल हरि।।
।।बोल हरि।।
कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ 
।।बोल हरि।।
अभाव आता जिसको जितना।स्वभाव दोष तुम समझो उतना।                                
सतकार्य को हरदम करना।सत के उपर मन को धरना।।1।।                         
।।बोल हरि।।
 आत्म रूप है ये जग सारा।सब ही अपना सब ही  प्यारा।                                               
।।बोल हरि।।
आरों में दोष क्यों देखें। निज स्वभाव में खुद को परखें।।2।।                               
सुख औरों का नहीं सुहाता।अपना भी जीवन बोझ बन जाता।                                     
कर्म करो नित ठाकुर कहते।सोच में जीवन क्यों तुम खोते।।3।।  
।।बोल हरि।।                                                            बढना जीवन लाभ है तेरा।बढकर ही सब पाएं सवेरा।                                       
विपदा से जब मन घबराता।आपद घुमके वहीं तो आता।।4।।
।।बोल हरि।।
पूर्ण शक्ति से कर्म है करना।अपात्र को तुम दान न देना।
जीवन अपना पूरण करलो।ठाकुर चरणों में निष्ठा धरलो।।5।।
।।बोल हरि।।
सबको अपना मीत बनाओ।सबमें प्रभू का प्रेम जगाओ।
जीवन का सुख जानो इसको।जीवन का सुख मानो इसको।।6।।
।।बोल हरि।।




।।बोल हरि।।
कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ 

।।बोल हरि।।
पृथ्वी का भार उतरे ना तब तक।निज कर्म पर चले ना जब तक।                                                        क्या है कर्म ये जानो पहले। वैशिष्ट्य अपना मानो पहले।।1।।                                                             ।।बोल हरि।।
वैशिष्ट्य जिसका जैसा जगेगा।चलन उसका वैसा उभरेगा।                                                                 वैशिष्ट्य पाली वे कहलाते।सबके अपने वैशिष्ट जगाते।।2।।                                                                ।।बोल हरि।।
निश दिन जीवन तेरा जैसा।कर्म प्रभाव होगा ही वैसा।                                                                        निष्ठा उनके प्रति आज जगालो।अपने कर्म की गति अपनालो।।3।।                                                               ।।बोल हरि।।
निज निष्ठा बिन कर्म ही कैसा।कर्म बिना धर्म निभे ना वैसा।                                                                    कर्म से अपना धर्म टिका है। धर्म से अपना जग ये बचा है।।4।।                                                              मात पिता संग रहते हो कैसे।अपने भाव संजोते हो कैसे।                                                                        मात पिता है ईष्ट समान।अन्तर्मन से करो सम्मान।।5।।                                                                            मां के प्रति श्रद्धा जगाओ।जीवन बगिया तुम महकाओ।                                                                         पिता के प्रति जगाओ टान।धरती पर हरदम रहेगी शान।।6।।





कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ 

।।बोल हरि।।
सफलता की बेदी सदाचार है।इससे बढता सत आचार है।                                                               सत आचार से मन बस होवे।नही तो चकाचौंध में खोवे।।1।।                                                        ।।बोल हरि।।
सत आचार से सत बढता है।सत से स्व तेज बढता है।                                                                      जीवन में जब तेज न होवे।मानुष जनम वृथा ही खोवे।।2।।                                                        ।।बोल हरि।।
मानुष जनम सफल हो तेरा।ठाकुर चरणों में बसाओ डेरा।                                                                 ठाकुर हैं सब जग के स्वामी।करो प्रणाम चढाओ प्रणामी।।3।।                                                   ।।बोल हरि।।
टका पराया मानुष अपना।यह तो है ठाकुर का कहना।                                                                    जितना सको मनुज को पाओ।जनम जनम की साध तुम पाओ।।4
।।बोल हरि।।                                                    
प्रेम ही जीवन प्रेम ही पूजा।प्रेम से बढकर काज ना दूजा।                                                                         प्रेम ही भक्ति प्रेम ही शक्ति।पे्रम ही सार है प्रेम ही मुक्ति।।5।।                                                                  ।।बोल हरि।।
मनुष्य जीवन है अनमोल।इसका लगाओ कोई न मोल।                                                                 मनुष्य बचेगा धर्म बचेगा।नहीं तो जीवन कहां धरेगा।।6।।
।।बोल हरि।।



कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ 
।।बोल हरि।।
निज दुर्बलता है शत्रु समान।शक्ति निष्फल होती तमाम।                                                                         अपनी शक्ति आप बचाओ।उंचे कर्म में खुद को लगाओ।
।।बोल हरि।।                                                  ठाकुर तो हैं सबके पासा।नाम प्रभाव से आएं पासा।                                                                            भ्रम से सबको बचना होगा।निज विवेक पर चलना होगा।। ।।बोल हरि।।























।।बोल हरि।।
कपट भाव से बचना होगा।सत के पथ को धरना होगा।                                                                           देने की प्रकृति जगाओ।पाने का सद्मार्ग पाओ।।3।। 
।।बोल हरि।।                                                                    पाने से पहले देना होगा।प्रत्याशा बिन जीना होगा।                                                                               जीने का मार्ग बहुत ही उंचा।द्वन्द बुद्धि से बचो हमेशा।।4।।  
।।बोल हरि।।                                                                  औरों के जीवन को बचाओ।धर्म का उंचा मार्ग तुम पाओ।                                                                          सबके अन्दर इष्ट है तेरा।देखे बिन कभी हो न सवेरा।।5।।   
।।बोल हरि।।                                                                आत्म बुद्धि आत्म ज्ञान का।रास्ता ऐसा निज कल्याण का।                                                                        अपने को तु जानले प्राणी।आया बताने जग का स्वामी।।6।।
।।बोल हरि।।

कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ 
।।बोल हरि।।

ठाकुर आए द्वार तुम्हारे।शरण में आओ हरि के दुलारे।                                                                   श्रुति तुम्हारी अभी जगेगी।सत् की आभा दिन दिन बढेगी।।1।।                                                           ।।बोल हरि।।
उनकी महिमा सबसे न्यारी। इष्टवृति से करें रखवारी।                                                                           इष्ट को जानो सुन ऐ प्राणीे।इष्ट बिना नहीं कुछ ऐ गामी।।2।।                                                                                         ।।बोल हरि।।
 इष्ट कौन है तुम ये जानो।इष्ट से रिश्ता अभी पहचानो।                                                                       इष्ट से तेरी है जयकार।इष्ट बिन सुना संसार।।3।।                                                                           ।।बोल हरि।।
 इष्ट से रिश्ता जोडें कैसे।इष्ट बिन बन्धन टूटे कैसे।                                                                      इष्ट से जुडकर चल ओ प्राणी।दुनिया है ये आनी जानी।।4।।                                                             ।।बोल हरि।।
यजन याजन करों तुम निशदिन।इष्टभृति तुम्.ा करो निश दिन।                                                               इष्टवृति समता देवेगी।समता ही तो विषमता हरेगी।।5।।                                                                   ।।बोल हरि।।
 ईष्टवृति बिन पूजा कैसी।ईष्टवृति महाव्रत के जैसी।                                                                                ईष्टवृति तुम करलो प्राणी।दुनिया में तेरी रहे कहानी।।6।।
।।बोल हरि।।
कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ 

।।बोल हरि।।
 इष्टवृति आर्यों की नीति।यही तो है जीवन की युक्ति।                                                                     इष्टवृति से ईष्ट जगेगा।ईष्ट जगे फिर क्या न मिलेगा।।1।।                                                                 ।।बोल हरि।।
जीवन का पथ बहुत कठिन है।कौन जाने कब रात और दिन है।
पडे जो प्राणी विषम राह में।इष्टवृति जगाओ चाह में।।2।।                                                                ।।बोल हरि।।
जीवन ये  फिर कभी न मिलेगा।ईष्टवृति सब बिघ्न हरेगा।                                                            पंच विधान पर चलना होगा। दृढता का भाव धरना होगा ।।3।।                                                       ।।बोल हरि।।
सम भाव से जग चलता है।भाव बिगडे तब क्या रहता है।                                                                  नम्रता मधुरता का भाव बनेगा।जीवन में तेरे शौर्य जगेगा।।4।।                                                                      ।।बोल हरि।।
चित में जागे जब तेरा सांर्ई।भेद बुद्धि सारी मिट जाई।                                                                 सारा जग अपना लगता है।आत्म ज्ञान स्वयं जगता है।।5।।                                                                  ।।बोल हरि।।
मन निर्मल होता है कैसे।चित शीतल होता है कैसे।                                                                             धर्म की महिमा भिन्न बताते।चलकर के हमें राह दिखाते।।6।।





कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ 
।।बोल हरि।।

सतनाम कलीकाल की शक्ति।इसी नाम में पालो भक्ति।                                                                 अन्दर नाम बाहर भी नामा। नाम नाम बस नाम ही नामा।।1।।                                                                       ।।बोल हरि।।
जप तप दान व्रत से निशदिन।काया छिजती दिन दिन क्षिण क्षिण।                                                   
 धर्म का मर्म कुछ ये समझाते।अस्तिवृद्धि की बात बताते।।2।।                                                    ।।बोल हरि।।
अभीष्ट मनोरथ सिद्ध कर देते।क्षण में मोह ममता हर लेते ।                                                        सत् आचार पर चल रे बन्दे।अपनी सुरत तु धरले बन्दे।। 3।।                                                                                               ।।बोल हरि।।
अस्तित्व की रक्षा होवे कैसे।मनमुखी मारग पाएं कैसे।                                                                 
 ठाकुर की है बात निराली।भक्तों की करते रखवाली ।।4।।                                                     ।।बोल हरि।।
जो जन जाने उनकी माया।सरल रीति से वो बच पाया ।                                                            आत्म बोध जन जन में जगाते।निज सूरत से आप मिलाते।।5।।                                                    ।।बोल हरि।।
खंडित दोष हैं उनके होते।शरण में उनके जो हैं रहते।                                                                आचार विचार का मर्म बताते।सत पथ की है राह दिखाते।।6।।

।।बोल हरि।।
कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ 

ब्रह्यानन्द स्वरूप तिहारा।परम पिता जग पालन हारा।                                                                                   सर्वव्यापक प्रभू पूरणकामा।स्वीकार करो मेरा प्रणामा।।2।।                                                                         ।।बोल हरि।।
नाम के साथ में आए नामी।जन जन के हंै वे हितकामी ।                                                                        सबके स्वामी अन्तर्यामी।नमामी नमामी नमामी नमामी।।3।।                                                                 ।।बोल हरि।।
अन्तर के सब मर्म वे जानें।अन्तर के सुप्त भाव जगावें।                                                                           अन्तर्मन की शक्ति बढावें।अन्तर्मन में नाम जगावें।।4।।                                                                    ।।बोल हरि।।
अन्तर में सतनाम जगाते।नाम की धून में सबको रमाते ।                                                                      नाम से सारे विपद टल जाए।नाम से सारी बात बन जाए।।5।।                                                             ।।बोल हरि।।
नाम नाम की धून जगाओ।रात दिवस मन में तुम गाओ।                                                                               नाम नाम में मन को लगालो।जीवन अपना दिव्य बनालो।।6।।

।।बोल हरि।।

कारण पुरूष पालक रक्षक प्रभू पुरूषोत्तम चरणार्विन्दे।
अहं नमामि ॐ अहं नमामि ॐ ॐ 

।।बोल हरि।।
























































































































































































































































































































































































































































































































































































































Pushpa Bajaj

  पुष्पा बजाज  ।।पुरूषोत्तम वन्दना।। पुरूषोत्तम की करूं वन्दना. पुरूषोत्तम को नमन करूं। जनम जनम मैं करूं वन्दना. जनम जनम मैं नमन करूं।। पुरू...